गणेश जी के बारे में, Ganesh ji ke bare mein, आप कितना जानते है । हिंदु धंर्म शास्त्रो के अनुसार गणपति गणेश जी Ganesh ji आदि देव हैं जिनकी पूजा सबसे पहले की जाती है।
समस्त धार्मिक उत्सवों, मुण्डन, विवाहोत्सव आदि सभी शुभ अवसरों पर सभी कार्य निर्विघ्न सम्पन्न करने के लिए सर्वप्रथम भगवान श्री गणेश जी Ganesh ji की पूजा ही की जाती है।
हिन्दू धर्म शास्त्रो के अनुसार जिस शुभ कार्य की शुरुआत गणेश पूजन के बिना होती है, उसका शुभफल मिलने की सम्भावना अत्यंत न्यून होती है ।
आइये हम आप को गणेश जी के बारे में, Ganesh ji ke bare mein, कुछ विशेष जानकारी देते है, जो शायद आप अभी तक नहीं जानते होंगे ।
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गणेश जी के रहस्य, Ganesh ji ke rahasy,
* गण का अर्थ होता है समूह और गणपति का अर्थ है उस समूह का अध्यक्ष। गणेश जी Ganesh ji का पूरा शरीर मानव का एवं सर हाथी का है।
* गणपति गणेश जी Ganesh ji विघ्नहर्ता अर्थात समस्त विघ्नों को दूर करने वाले एवं बुध्दि के देवता कहे जाते है।
* गणेश का अति सुन्दर शरीर अपने में कई गूढ़ और विशिष्ट अर्थ को संजोए हुए है।
* लम्बा उदर गणपति जी Ganpati Ji की असीमित सहन शक्ति का प्रतीक है।
* चार भुजाएं चारों दिशाओं में सर्वव्यापकता का धोतक हैं ।
* गणपति जी की छोटी-छोटी पैनी आंखें उनकी तीक्ष्ण दृष्टि,
* विघ्नहर्ता के बड़े-बड़े कान उनकी सुनने की अधिक शक्ति,
* और उनकी लम्बी सूंड तेज बुध्दि का प्रतीक है।
* गणेश जी का एक हाथ अभय की मुदा में उठा हुआ हाथ, जो संरक्षण का प्रतीक है – कि गणपति के भक्तो को घबराना नहीं चाहिए – क्योंकि गणपति सदैव अपने भक्तो के साथ है ।
गणेश जी Ganesh ji का दूसरा हाथ नीचे की तरफ है और हथेली बाहर की ओर है या इसमे लड्डू है – जो कहती है कि वह निरंतर हमें सुख समृद्धि Shukh Samriddhi दे रहे हैं।
* वह अपने दो हाथो में अंकुश और पाश को धारण किये हुए है । उनके एक हाथ में अंकुश जीवन में सजगता का प्रतीक है और और दूसरे हाथ में पाश जीवन में नियंत्रण को बताता है।
* गणेश जी Ganesh Ji का एक दाँत ही है जो कि एकाग्रचित होने को दर्शाता है इसलिए गणेश जी Ganesh Ji को एकदंत भी कहा जाता है। इसके पीछे एक कथा है।
माना जाता है कि एक बार परशुरामजी जी भगवान शिव Bhagwaan Shiv के दर्शन के लिए कैलाश पर्वत पर गए। उस समय भगवान भोले नाथ ध्यानमग्न थे अतः गणेश जी Ganesh Ji ने परशुरामजी को अंदर जाने से रोक दिया।
* तब क्रोधित हो कर परशुराम जी ने गणेश जी Ganesh Ji पर अपने फरसे से वार कर दिया। वह फरसा परशुराम जी को भगवान शिव ने ही दिया था, इसलिए उसका सम्मान रखने के लिए गणेश जी ने उस फरसे का वार अपने दांत पर झेल लिया, जिसके फलस्वरूप उनका एक दाँत टूट गया और वह एकदन्त कहलाये।
* गणेश जी Ganesh Ji चूहे की सवारी करते है । चूहा इस बात का प्रतीक है कि जो बंधन, जिस अज्ञानता में हम घिरे है, चूहा उसे कुतर कर, एक-एक परत को काट कर समाप्त कर देता है। चूहा हमें उस परम ज्ञान की ओर ले जाता है जिसका प्रतिनिधित्व गणेश करते हैं।
शास्त्रो में कई स्थानों में गणेश जी Ganesh Ji का वाहन सिंह,मयूर, मूषक और घोड़ा को बताया गया है ।
* सतयुग में भगवान गणेशजी का वाहन सिंह है और उनकी भुजाएं 10 हैं तथा इनका नाम विनायक है ।
* त्रेतायुग में भगवान विघ्नहर्ता का वाहन मयूर है, उनकी भुजाएं 6 हैं और रंग श्वेत कहा गया है इसीलिए इन्हें मयूरेश्वर के नाम से बुलाया गया है ।
* द्वापरयुग में श्री गजानन का वाहन मूषक है, उनकी भुजाएं 4 एवं रंग लाल हैं। इस लिए इस युग में गणेश जी Ganesh Ji गजानन नाम से प्रसिद्ध हैं ।
* कलियुग में गणपति जी Ganpati Ji का वाहन घोड़ा है, इनकी 2 भुजाएं और वर्ण धूम्रवर्ण है। इसीलिए कलयुग में उनका नाम धूम्रकेतु भी है।
* गणपति जी को रोली का तिलक लगाना चाहिए ।
* गणपति जी को लाल रंग के फूल अत्यंत प्रिय है ।
* भगवान गजानन दूर्वा और शमी पत्र चढ़ाने से अत्यन्त प्रसन्न होते है ।
* गणपति जी को बेसन के और मोदक के लड्डू बहुत ही पसंद हैं।
* ‘ॐ गं गणपतये नम:” मन्त्र का जाप करने से गणपति जी अपने भक्तो पर शीघ्र ही कृपालु होते है।
गणेश उत्सव Ganesh Utsav हिन्दुओं का एक प्रमुख पर्व है जो कि भाद्र माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी से 10 दिनों तक बड़े धूम- धाम से मनाया जाता है। इन दस दिनों में विघ्ननाशक भगवान गणेश की विशेष पूजा का विधान है।
बहुत ही भाग्यशाली होते है वह लोग जो गणेश चतुर्थी Ganesh Chaturthi / गणेश उत्सव Ganesh Utsav में पूर्ण श्रद्धा और अपने सामर्थ्य के अनुसार अपने घर / प्रतिष्ठान में भगवान गणपति की स्थापना करते है या इन दिनों नित्य प्रभु गजानन की पूजा अर्चना करते है ।
गणेश पुराण के अनुसार गणेश उत्सव Ganesh Utsav / गणेश चतुर्थी Ganesh Chaturthi में भगवान गणपति जी की पूर्ण श्रद्धा से विधिपूर्वक पूजा करने से गणेश जी की अपने भक्तों के सारे कष्ट, अनेक सारे संकट हर लेते है उसकी समस्त मनोकामनाए पूर्ण करते है।
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शास्त्रो के अनुसार भाद्रपद माह में शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को मध्याह्न में भगवान गणेश जी का जन्म हुआ था । भगवान गणेश का जन्म मध्याह्न काल में होने के कारण ही गणेश पूजा के लिये मध्याह्न ( दोपहर ) के समय को सर्वाधिक उपयुक्त माना जाता है।
गणेश चतुर्थी Ganesh Chaturthi के दिन, भगवान गणेश जी की स्थापना और गणेश जी की विधिवत पूजा, मध्याह्न के दौरान की जानी चाहिये, तभी श्रेष्ठ फलो की प्राप्ति होती है।
वर्ष 2026 में गणेश चतुर्थी की शुरुआत 14 सितम्बर सोमवार से हो रही है जिसका समापन25 सितंबर 2026 अनंत चतुर्दशी के दिन किया जाएगा ।
शास्त्रों के अनुसार गणेश जी का जन्म दोपहर के समय में हुआ था इसलिए गणेश चतुर्थी के दिन गणेश जी की आराधना दोपहर के समय में ही करनी चाहिए।
गणेश चतुर्थी शुभ मुहूर्त (Ganesh Chaturthi Shubh Muhurat):
गणपति स्थापना के शुभ मुहूर्त
14 सितम्बर सोमवार को सुबह 11 बजकर 42 मिनट से लेकर दोपहर 12 बजकर 24 मिनट तक रहेगा, एवं
दोपहर 01 बजकर 40 मिनट से लेकर सांय 06 बजकर 02 मिनट तक का समय गणपति जी की मूर्ति की स्थापना के लिए शुभ मुहूर्त रहेगा। आप इस अवधि में गणपति जी की मूर्ति की स्थापना कर सकते हैं।
गणेश विसर्जन की तिथि – शनिवार 25 सितंबर 2026 को अनंत चतुदर्शी के दिन
इस बार गणेश चतुर्थी पर प्रीति योग, सर्वार्थ सिद्धि, रवि योग के साथ इंद्र-ब्रह्म योग का भी शुभ संयोग बना रहेगा। इस दिन कर्क राशि में बुध और शुक्र के होने से अति शुभ लक्ष्मी नारायण योग का भी निर्माण हो रहा है । इसके अतिरिक्त गणेश चतुर्थी पर बुधवार का महासंयोग भी अति कल्याणकारी है ।
गणेश चतुर्थी Ganesh Chaturthi के दिन बहुत से लोग अपने अपने घरों में भगवान गणेश जी Ganesh ji की नई मूर्ति को स्थापित करते हैं एवं अंतिम दिन गणेश प्रतिमा का विसर्जन कर दिया जाता है। गणेश चतुर्थी Ganesh Chturthi के दिन एक विशेष विधि से गणेश प्रतिमा को स्थापित किया जाता है।
घर में बैठे हुए गणेश जी Ganesh ji और कार्यस्थल पर खड़े गणपतिजी का चित्र लगाना ही हितकर होता है। लेकिन ये ध्यान रखें कि गणेशजी Ganesh ji के दोनों पैर जमीन का स्पर्श करते हुए हों, ताकि कार्य में स्थिरता आए।
गणेश चतुर्थी Ganesh Chaturthi के दिन सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नान आदि करके शुद्ध लाल रंग के वस्त्र पहनना अति शुभ होता है। गणेश पूजा Ganesh Puja के लिये मध्याह्न ( दोपहर ) के समय को सर्वाधिक उपयुक्त माना जाता है।
श्री गणेश जी की प्रतिमा / फोटो ईशाण कोण में अथवा उत्तर दिशा में इस तरह स्थापित करें कि उनका श्री मुख पश्चिम दिशा की ओर रहे । गणेश जी की मूर्ति चित्र स्थापित करते समय नीचे लाल रंग का नया कपड़ा बिछाकर उस पर फूलो का आसान तैयार करें फिर उसके ऊपर गणपति जी की मूर्ति अथवा चित्र स्थापित करें । स्थापना / पूजा के दौरान “गं गणपतये नमः” मंत्र का जाप करना चाहिए।
स्थापना के पश्चात सर्वप्रथम भगवान श्री गणेश को पंचामृत से स्नान कराकर शुध्द जल से स्नान कराएं, तत्पश्चात रोली से तिलक करके भीगे अक्षत, दूर्वा, शमी पत्र, लाल फूल, घी, मोदक के लड्डू अर्पित करके उनकी पूजा आराधना करें ।
गणेशजी Ganesh ji की पूजा आराधना करते समय घी का दीपक जलाकर मूर्ति पर सिंदूर / रोली से तिलक करते हुए उनकी मूर्ति पर 11 /21 / 51 /101 दूर्वा चढ़ाएँ । इन दिनों भगवान गजानन को नित्य मोदक / गुड़ या बूंदी के लड्डुओं का भी भोग लगाएं। लेकिन ध्यान रखें कि उन्हें तुलसी कतई ना चढ़ाएँ ।
गणेश जी Ganesh ji की पूजा करते समय उन्हें पान के पत्ते और सुपारी भी चढ़ानी चाहिए और हल्दी, कुमकुम और दक्षिणा भी रखनी चाहिए। गणेश जी Ganesh ji को लाल फूल बहुत पसंद है अत: उनकी पूजा में लाल फूल, और शमी पत्र चढ़ाना चाहिए ।
गणेश जी को सफ़ेद चन्दन और गेंदे का फूल भी नहीं चढ़ाना चाहिए ।
गणेश जी Ganesh ji को श्री फल या नारियल चढ़ाते हुए 21 लड्डुओं का भोग भी लगाना चाहिए, जिसे पूजा के बाद प्रशाद के रूप में बाँट दें, फिर कपूर जलाकर उनकी आरती करें।
सबसे अंत में सभी गलतियों की छमा याचना करते हुए भगवान को प्रणाम करना चाहिए। गणपति का पूजन शुद्ध आसन पर बैठकर अपना मुख पूर्व अथवा उत्तर दिशा की तरफ करके करें।
गणेश चतुर्थी Ganesh Chaturthi के 10 दिनों में प्रातः एवं संध्या के समय गणेश चालीसा, गणेश स्तुति, श्रीगणेश सहस्रनामावली, गणेश जी Ganesh ji की आरती, संकटनाशन गणेश स्तोत्र आदि का पाठ करें।
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Published By : Memory Museum Updated On : 2026-08-25 00:30:00 PM
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गणेश जी को कैसे प्रसन्न करे, Ganesh ji ko kaise prasann kare,
* भगवान श्री गणेश विघ्नहर्ता कहलाते है । किसी भी पूजा में सबसे पहले गणेश जी की आराधना Ganesh ji ki aradhana की जाती है ।
कहते है कि यदि गणेश चतुर्थी Ganesh Chaturthi / चतुर्थी तिथि / बुधवार को भगवान श्री गणेश जी को प्रसन्न करने के उपाय Ganesh ji ko prasann krne ke upay किए जाएं तो भक्तों की समस्त इच्छाएँ पूरी हो सकती है।
* भगवान गणेश स्वयं रिद्घि-सिद्घि के दाता व शुभ-लाभ को प्रदान करने वाले हैं। संकल्प अनुसार गणपति जी की पूजा ganesh ji ki pooja अर्चना करने से विघ्नहर्ता अपने भक्तों की सभी बिगड़ी बात बना देते हैं। वह भक्तों की सभी बाधाएं, संकट, रोग, शत्रु तथा दारिद्रता को दूर करते हैं।
* मान्यता है भगवान गणपति की पूर्ण श्रद्धा एवं संकल्प से साधना-आराधना करने से भक्तों के घोर से घोर संकट भी दूर हो जाते है,उन्हें समस्त चिंताओं से मुक्ति मिलती है, तथा उनके जीवन से विघ्न दूर होकर उन्हें अपने सभी कार्यों में सफलता मिलती है।
* आइये हम आपको कुछ आसान से उपाय बताते है जिससे आप गणेश जी को प्रसन्न करके अपनी सभी मनोकामनाओं को पूर्ण कर सकते है।
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गणेश जी को कैसे प्रसन्न करे, Ganesh ji ko kaise prasann kare,
* गणपति जी की पूजा करते समय सर्वप्रथम गणेश जी को प्रसन्न करने के लिए Ganesh Ji Prasann karne ke leye रोली ,लाल सिंदूर का तिलक लगाएं। सिंदूर की लाली गणेश जी को बहुत ही ज्यादा पसंद है।
गणेश जी को तिलक लगाकर पूजा करने के बाद अपने माथे पर भी रोली का तिलक अवश्य ही लगाएं लगाएं।
इससे गणेश जी प्रसन्न Ganesh ji ko prasann होते है, उनकी विशेष कृपा प्राप्त होती है, भगवान एकदन्त जातक की सभी दिशाओं से रक्षा करते हैं, उसे किसी भी चीज़ की कोई भी कमी नहीं रहती है ।
* गणपति जी को प्रसन्न करने का आसान उपाय ganpati ji ko prasann karne ka asan upay है नित्य दूर्वा से भगवान गणपति जी की पूजा करना। दूर्वा गणेश जी को अत्यंत प्रिय है शास्त्रों के अनुसार दूर्वा में अमृत मौजूद होता है।
* गणेश जी को प्रसन्न करने के लिए नित्य सुबह स्नान पूजा करके गणेश जी को 5/11/21 दूर्वा यानी हरी घास गिन कर अर्पित करें। ध्यान रहे कि दुर्वा गणेश जी के मस्तक पर रखना चाहिए उनके चरणों में दुर्वा नहीं रखें और भगवान विघ्न विनाशक को दुर्वा अर्पित करते हुए ‘इदं दुर्वादलं ऊं गं गणपतये नमः’ मंत्र भी अवश्य ही बोलें ।
* गणपति अथर्वशीर्ष के अनुसार जो व्यक्ति गणेश जी की पूजा नित्य दुर्वांकुर से करता है वह देवताओं के कोषाध्यक्ष कुबेर के समान धनवान हो जाता है, अर्थात उस व्यक्ति के पास धन-धान्य की कभी कमी नहीं रहती है।
* गणेश जी ( Ganesh ji ) को मोदक का भोग बहुत ही प्रिय है। शास्त्रों के अनुसार भगवान गणेश जी को प्रसन्न करने के लिए सर्वोत्तम उपाय ganesh ji ke upay मोदक का भोग है । माना जाता है कि यदि गणपति पूजा में मोदक का भोग अर्पित नहीं किया तो जातक की पूजा अधूरी ही रहती है।
शास्त्रों में मोदक को अमृत मिश्रित माना गया है। पद्म पुराण के सृष्टि खंड के अनुसार मोदक का निर्माण अमृत से हुआ है।
गणपति अथर्वशीर्ष के अनुसार जो व्यक्ति गणेश जी Ganesh ji को मोदक का भोग लगाता है गणपति उसका अवश्य जी मंगल करते हैं। मोदक का भोग लगाने वाले जातक की समस्त मनोकामना शीघ्र ही पूरी होती है।
* जीवन में आर्थिक लाभ ( Arthik Labh ) और किसी भी प्रकार के संकट निवारण के लिये गणेश उत्सव के किसी भी दिन से अथवा शुक्ल पक्ष के बुधवार से शुरू करते हुए भगवान गणेश Bhagwaan Ganesh की मूर्ति पर कम से कम 21 दिन तक थोड़ी-थोड़ी जावित्री चढ़ावे और रात को सोते समय थोड़ी जावित्री स्वयं भी खाकर सोएं ।
यह प्रयोग 21, 42, 64 या 84 दिनों तक अवश्य ही करें। इससे सभी विघ्न दूर होते है, घर में निश्चय ही धन (Dhan), सुख समृद्धि ( Sukh Smradhi ) का वास होता है।
मान्यता है की कैसा भी कार्य हो गणेश जी की कृपा ganesh ji ke kripa से अधिकतम 84 दिनों तक इस उपाय को करने से कार्य में अवश्य ही सफलता मिलती है।
* जो लोग भगवान गणेश जी Ganesh ji की घी से नित्य पूजा करते है उन पर प्रभु विघ्नहर्ता की सदैव कृपा बनी रहती है । घी को पुष्टिवर्धक और रोगनाशक कहा जाता है। पंचामृत में एक अमृत घी भी होता है। भगवान गणेश को घी काफी पसंद है।
गणपति अथर्वशीर्ष के अनुसार घी से गणेश की पूजा करने से जातक को ज्ञान और बुद्धि की प्राप्ति होती है।
कहते है कि नित्य घी से गणेश की पूजा करने वाला व्यक्ति अपनी बुद्धि, ज्ञान और योग्यता के बल से संसार में श्रेष्ठ स्थान हासिल कर लेता है।
*शास्त्रों के अनुसार जो लोग नित्य भगवान गजानन की शमी पत्र से पूजा करते है उन पर सदैव गणेश जी प्रसन्न रहते है । शमी गणेश जी को अत्यंत प्रिय है। शमी ही एक मात्रा पौधा है जिसकी पूजा से भगवान शंकर, गणेश जी और शनि सभी प्रसन्न होते हैं।
शास्त्रों के अनुसार भगवान श्री राम ने रावण पर विजय पाने के लिए शमी की पूजा की थी।
जो जातक शमी के कुछ पत्ते नियमित रूप से गणेश जी को अर्पित करता है उस पर गणेश जी के कृपा ganesh ji ki kripa जीवन में कोई भी संकट उसके पास भी नहीं आता है उसके घर में धन – धान्य , सुख – समृद्धि की कोई भी कमी नहीं होती है ।
* भगवान गणेश को प्रसन्न bhagwan ganesh ko prasann करने के लिए उन्हें पवित्र अखंडित अक्षत अर्थात चावल अर्पित करें। अखंडित अर्थात जो टूटा हुआ नहीं हो। गणेश जी को सूखा अक्षत नहीं चढ़ाते है।
उनको अक्षत चढ़ाने से पहले उसमें कुछ बुँदे गंगाजल / जल की डालकर उसे गीला करें फिर यह मन्त्र ‘इदं अक्षतम् ऊं गं गणपतये नमः’ बोलते हुए गणेश जी Ganesh ji को तीन बार अक्षत चढ़ाएं। इससे जातक को अपने कार्य क्षेत्र में मनवाँछित सफलता प्राप्त होती है।
* गणेश जी पर तुलसी नहीं चढाई जाती है । आचार भूषण ग्रंथानुसार भगवान श्रीगणेश को तुलसीदल को छोड़कर सभी प्रकार के फूल चढ़ाए जा सकते हैं।
पद्मपुराण आचाररत्न में भी लिखा है कि ‘न तुलस्या गणाधिपम’ अर्थात् तुलसी से गणेश जी की पूजा कभी न करें।
गणेश जी को सफ़ेद चन्दन और गेंदे का फूल भी नहीं चढ़ाना चाहिए ।
Published By : Memory Museum Updated On : 2025-08-27 11:48:00 PM
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भाद्रपद के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी से 10 दिनों के गणेश उत्सव प्रारम्भ हो जाते है, इन दिनों गणेश जी की आराधना परम फलदाई है, सभी तरह के संकट दूर होते है । लेकिन भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी के दिन chandra darshan ka dosh, चंद्र दर्शन का दोष, लगता है ।
भाद्रपद के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी जिसे गणेश चौथ भी कहते है इस दिन चंद्र देव का दर्शन करना बिलकुल मना है। इस दिन यह संयोग मंगलवार 26 अगस्त को पड़ेगा ।
शास्त्रों के अनुसार इस दिन चंद्रमा के दर्शन करने से व्यक्ति के उपर भविष्य में कलंक या चोरी का इल्जाम लग सकता है।
शास्त्रों में इसके पीछे एक कथा बताई गयी है।
जानिए चंद्र दर्शन का दोष, chandra darshan ka dosh, चंद्र दर्शन का दोष क्या है, chandra darshan ka dosh kya hai, चतुर्थी का चन्द्रमा क्यों नहीं देखना चाहिए, chaturthi ka chandrma kyon nahi dekhna chahiye, chandra darshan 2026,
उस कथा के अनुसार एक दिन भगवान गणपति जी अपने वाहन चूहे की सवारी करते हुए गिर पड़े तो चंद्र देव ने उन्हें देख लिया और वह गणेश जी पर हंसने लगे।
चंद्र देव को अपना उपहास उड़ाते देख गणेश जी क्रोधित हो गए और उन्होंने चंद्र देव को श्राप दिया कि जाओ तुम्हें अब से कोई भी देखना पसंद नहीं करेगा, और यदि जो तुम्हे देखेगा तो वह कलंकित हो जाएगा।
तब चन्द्रमा जी को अपनी गलती का अहसास हुआ और वह गणेश जी के श्राप से चंद्र बहुुत दुखी हो गए। चन्द्रमा जी को इस श्राप से मुक्ति दिलाने के लिए तब चंद्र देव के साथ समस्त देवताओं ने भी गणपति जी पूजा अर्चना की इससे गणपति जी प्रसन्न हो गए और उन्होंने देवताओं से वरदान मांगने को कहा।
तब सभी देवताओं ने विनती की कि हे गणेश जी आप चंद्र देव को अपने श्राप से मुक्त कर दीजिये ।
देवताओं की विनती सुनकर गणपति ने कहा कि मैं अपना श्राप तो वापस नहीं ले सकता लेकिन इसमें कुछ बदलाव करके इसका दोष कम जरूर कर सकता हूं।
भगवान गणेश ने चन्द्रमा से कहा कि मेरा यह श्राप अब से आपके ऊपर वर्ष में सिर्फ एक ही दिन मान्य रहेगा। जो कोई भी भाद्रपद की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को आपको देखेगा उसके ऊपर मिथ्या कलंक लगेगा ।
इसलिए भाद्रपद की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को बहुत सावधान रहना चाहिए, इस दिन चन्द्रमा जी के दर्शन बिलकुल भी नहीं करने चाहिए ।
मान्यता है कि यदि चतुर्थी के दिन जाने अनजाने में चंद्रमा के दर्शन हो जाएं तो उसके दोष से बचने के लिए एक छोटा सा कंकर या पत्थर का टुकड़ा लेकर किसी की छत पर फेंक देना चाहिए । इसीलिए बहुत से लोग गणेश चतुर्थी को पत्थर चौथ भी कहते है।
इस सम्बन्ध में शास्त्रों में एक और कथा भी मिलती है ………
इस कथा के अनुसार जब भाद्रपद की चतुर्थी के दिन भगवान गणेश जी के मस्तक पर हाथी का सिर लगाया गया तो उसके बाद गणेश जी पृथ्वी की परिक्रमा करके देवताओं में प्रथम पूज्य कहलाए । तब सभी देवी-देवताओं ने गणेश जी की वंदना की लेकिन चंद्र देव ने अभिमान वश ऐसा नहीं किया।
चंद्रमा को अपने रूप-रंग पर घमंड था और गजमस्तक के कारण उनकी आँखों में गणेश जी के लिए उपहास था। इससे गणेश जी क्रोधित हो गए और उन्होंने चद्र्मा जी को श्राप दिया कि हे चंद्र देव तुम्हे अपने रूप पर बहुत अभिमान है जानो आज से तुम काले हो जाओगे।
इस पर चंद्र देव को अपनी गलती का अहसास हुआ और वह इस श्राप से बहुत भयभीत हो गए उन्होंने बार बार गणेश जी की वंदना करते हुए उनसे माफी मांगी।
तब गणेश जी ने उन पर दया करके कहा कि मेरा यह श्राप आप पर केवल एक ही दिन भाद्रपद की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को मान्य होगा, जैसे-जैसे सूर्य की किरणें फिर से चंद्रमा पर पड़ेंगी उनकी आभा वापस आ जाएगी।
उसी समय से गणेश चतुर्थी के दिन चंद्र दर्शन करना वर्जित हो गया, मान्यता है कि यदि कोई ऐसा करता है तो उस पर भविष्य में कोई बड़ा मिथ्या आरोप लगता है।
ज्योतिषाचार्य मुक्ति नारायण पाण्डेय ( हस्त रेखा, कुंडली, ज्योतिष विशेषज्ञ )
Vishwakarma puja, विश्वकर्मा पूजा, विश्वकर्मा पूजा 2026,
हिन्दू धर्म में देवताओं के शिल्पी भगवान विश्वकर्मा को समर्पित विश्वकर्मा पूजा, Vishwakarma puja, का बहुत महत्त्व है ।
प्रत्येक वर्ष 17 सितम्बर को विश्वकर्मा पूजा, Vishwakarma puja, श्रम दिवस का पर्व मनाया जाता है । भगवान विश्वकर्मा इस ब्रह्माण्ड के सबसे बड़े अविष्कारक माने जाते है उन्होंने अनेकानेक अद्भुत अविष्कार किये हैं।
विश्वकर्मा जी के पिता वास्तुदेव जी और माता का नाम अंगिरसी था। इनकी ऋद्धि सिद्धि और संज्ञा नाम की तीन पुत्रियाँ थी जिनमें से ऋद्धि सिद्धि का विवाह भगवान गणेश से हुआ था तथा,
तीसरी पुत्री संज्ञा का विवाह महर्षि कश्यप और देवी अदिति के पुत्र भगवान सूर्यनारायण से हुआ था और यमराज , यमुना , कालिंदी और अश्वनीकुमार इनकी ही संताने हैं।
मनु, मय, त्वष्ठा, शिल्पी और देवज्ञ इनके पुत्र कहे गए है ये सभी महान शिल्पकार और निर्माण कर्ता माने गए है ।
भगवान विश्वकर्मा जी की प्रतिमा, चित्र सामान्यतः प्रत्येक कारखानों, निर्माण स्थलों, कार्यस्थल में स्थापित किए जाते हैं।
उनकी गणना पंचदेवों में की जाती है और वे दिव्य निर्माणों के अधिपति हैं।
वैसे तो किसी भी हिन्दू पर्व की कोई भी तिथि निश्चित नहीं होती है क्योंकि वह चन्द्रमा के गोचर के अनुसार मनाये जाते है लेकिन विश्वकर्मा पूजा का पर्व चन्द्रमा नहीं वरन सूर्य के गोचर के अनुसार मनाया जाता है ।
जब सूर्य ग्रह का कन्या राशि में गोचर होता है तो विश्वकर्मा जयंती मनाई जाती है और सामान्यता : यह हर साल 17 सितंबर को ही होता है । यही वजह है कि विश्वकर्मा जयंती 17 सितंबर को ही मनाई जाती है ।
इस ब्रह्माण्ड के सबसे महान अविष्कारक देवताओं के वास्तुकार, प्रमुख शिल्पी, भगवान विश्वकर्मा ने इंद्रपुरी, स्वर्गलोक, यमपुरी, द्वारका नगरी, कुबेर पुरी, लंका और हस्तिनापुर इत्यादि अनेको अद्वितीय नगरों का निर्माण किया था ।
भगवान विश्वकर्मा जी ने अनेको अस्त्र शास्त्र जैसे भगवान श्री विष्णु जी का सुदर्शन चक्र, भगवान भोलेनाथ जी का त्रिशूल, हनुमान जी की गदा, यमराम के कालदंड, कर्ण के कुण्डल और पुष्पक विमान आदि का निर्माण भी किया था।
ध्यान रहे 17 सितम्बर को भगवान विश्वकर्मा जी की पूजा की जाती है लेकिन इस दिन विश्वकर्मा जी की जयंती अर्थात प्राकट्य दिवस नहीं है । शास्त्रों के अनुसार भगवान विश्वकर्मा जी का प्राकट्य दिवस माघ शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि को माना जाता है ।
विश्वकर्मा पूजा पर लोग अपने अपने कल – कारखानों, दफ्तरों को सजाकर, अपनी मशीनों, औजारों और किसी भी तरह के निर्माण कार्यों में काम आने वाले उपकरणों, वाहनों की विधिवत पूजा करके अपने कार्य में श्रेष्ठ तरक्की के लिए प्रार्थना करते हैं।
विश्वकर्मा पूजा में इंजिनियर, वास्तुविद, शिल्पकार, कारीगर, किसी भी तरह का यांत्रिक कार्य करने वाले, मजदूर आदि विशेष कर बहुत जी हर्ष और उल्लास से भाग लेते है।
इस दिन इनके इस मन्त्र से इनकी पूजा की जाती है
ॐ विश्वकर्मणे नमः॥
मान्यता हैं कि भगवान ब्रह्मा जी के मानस पुत्र और महान वास्तुकार भगवान विश्वकर्मा जी की पूजा करने, इस दिन अपनी मशीन, औजार और वाहन आदि की पूजा करने से वे काम की बीच में कभी भी धोखा नहीं देते, सारे कार्य निर्विघ्न पूरे हो जाते हैं।
Chandr darshan dosh ke uapy, चंद्र दर्शन दोष के उपाय,
भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को हिंदू धर्म में गणेश चतुर्थी या कलंक चतुर्थी के रूप में जाना जाता है क्योंकि इस रात्रि को चन्द्रमा जी के दर्शन करने पर व्यक्ति को भविष्य में झूठा कलंक लगने का भय बना रहता है।
इसी कारण किसी भी व्यक्ति को गणेश चतुर्थी पर भूलकर भी चंद्रमा के दर्शन नहीं करना चाहिए।
लेकिन शास्त्रों में चंद्र दर्शन दोष के उपाय, Chandr darshan dosh ke uapy, भी बताये गए है जिनको करने से इस दिन चंद्रमा के दर्शन का दोष समाप्त हो जाता है
चंद्र दोष के सम्बन्ध की कथा:
शास्त्रों में इस सम्बन्ध में कई कथाएं वर्णित है । एक पौराणिक कथा के अनुसार जब भगवान श्री गणेश जी अपने पिता शिव और माता पार्वती की परिक्रमा करके प्रथम पूज्यनीय कहलाए तो सभी देवी-देवताओं ने वंदना की, लेकिन चंद्रदेव ने अपने रूप एवं सौंदर्य का अभिमान करते हुए ऐसा नहीं किय।
इससे नाराज होकर भगवान गणेश जी ने चंद्र देव को काले होने का श्राप दे दिया। तब चंद्रमा को अपनी गलती का अहसास हुआ और वह गणपति जी से माफी मांगने लगे और उन्होंने इस श्राप से मुक्ति का उपाय पूछा।
तब गणेश जी ने कहा कि जैसे-जैसे सूर्यदेव का प्रकाश उन पर पड़ेगा, वैसे-वैसे उनका तेज स्वरूप वापस लौट आएगा। लेकिन इस एक दिन उनके दर्शन करने से व्यक्ति को कलंक का भागी होना पड़ेगा ।
यह घटना भाद्र पक्ष के दिन अर्थात गणेश चतुर्थी के दिन घटी थी, इसलिए तभी से इस दिन चंद्र देव के दर्शन निषेध हो गए ।
इसीलिए चतुर्थी की रात्रि को चन्द्रमा ना देखने की सलाह दी जाती है। लेकिन अगर गलती से इस रात कोई चांद देख ले तो मान्यतानुसार उसे झूठा कलंक झेलना पड़ता है।
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चतुर्थी की रात लोग चन्द्रमा को अर्घ्य देखते हैं, लेकिन ऐसा चांद देखे बिना करना होता है। * लेकिन यदि गलती से कोई चांद देख ले और उसके बाद इस दोष से मुक्त होना हो तो निम्नलिखित मंत्र का 108 बार जाप कर लें:-
इसका अर्थ है कि ……. सुंदर सलोने कुमार! इस मणि के लिये ही सिंह ने प्रसेन को मारा हैं और जाम्बवन्त ने उस सिंह का संहार किया हैं। अतः तुम मत रो । अब तुम्हारा ही इस स्यमंतक मणि पर अधिकार हैं।
चतुर्थी के दिन चन्द्रदर्शन से कलंक लगता है। लेकिन इस मंत्र को पढ़ने, अथवा स्यमन्तक मणि कथा को पढ़ने – सुनने से उसका प्रभाव बहुत कम हो जाता है।
* दसवें स्कन्द के 57 वें अध्याय का पाठ करने से निश्चय जी चंद्र दर्शन का दोष समाप्त हो जाता है ।
* मान्यता है कि यदि चतुर्थी के दिन जाने अनजाने में चंद्रमा के दर्शन हो जाएं तो उसके दोष से बचने के लिए एक छोटा सा कंकर या पत्थर का टुकड़ा लेकर किसी की छत पर फेंक देना चाहिए । इसीलिए बहुत से लोग गणेश चतुर्थी को पत्थर चौथ भी कहते है।
* शाम के समय अपने किसी अतिप्रिय निकट संबंधी से कटु वचन बोलें, उसे बुरा भला कहे और अगले दिन प्रातः उससे क्षमा मांग लें।
* गणपति जी की प्राण प्रतिष्ठित मूर्ति पर 21 लड्डूओं का भोग लगाएं। फिर 5 लड्डुओं को गणेश जी की मूर्ति के पास रखकर शेष 16 लड्डुओं को ब्राह्मणों में बांट दें।
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भगवान गणेश को विघ्नहर्ता भी कहते है। मान्यता है कि किसी भी शुभ काम को शुरू करने से पहले भगवान गणपति जी की आराधना करने से समस्त कार्य निर्विघ्न संपन्न हो जाते है। लेकिन क्या आप जानते है कि गणेश जी का जन्म, Ganesh ji ka janam, कैसे हुआ ?
शास्त्रों में गणेश जी का जन्म, Ganesh ji ka janam, के संबंध में दो कथाएं मिलती हैं। यह तो लगभग सभी लोग जानते हैं कि गणपति का धड़ कटकर उनके शरीर से अलग हो गया था और बाद में एक हाथी के बच्चे का सिर काटकर गणेश जी के धड़ से जोड़ा गया था ?
लेकिन उनका सर कटा किस वजह से ? उनके सिर कटने की कथा दो प्रमुख पुराणों शिव पुराण में और ब्रह्मवैवर्त पुराण में अलग अलग लिखी है।
पहली कथा के अनुसार जो हमें शिव पुराण में मिलती है और बहुत से लोगो ने सुनी है उसके अनुसार …….. एक बार माता पार्वती स्नान करने जा रही थी उस समय घर में कोई भी नहीं था तब उन्होंने घर की देखभाल करने के लिए अपने शरीर के मैल से एक खुबसूरत बालक का पुतला बनाकर उसमें प्राण डाल दिए। उन्होंने उस खुबसूरत बालक को किसी को भी अंदर न आने देने का आदेश दिया और फिर वह स्नान करने चली गईं।
वह बालक बड़ी मुस्तेदी से घर की रक्षा करने लगा, कुछ ही देर में वहां पर भगवान भोलेनाथ आ गए और घर के अन्दर जाने लगे। बालक गणेश उन्हें नहीं पहचानते थे इसलिए उन्होंने शंकर जी को घर के अंदर जाने से रोक दिया।
भगवान शिव भी बालक को अपने घर में देखकर आश्चर्य में पड़े हुए थे, उन्होंने गणेश जी को समझाने की कोशिश की लेकिन गणपति जी पार्वती जी के आदेश के कारण अडिग थे और नहीं माने। तब भगवान शिव ने क्रोध में आकार अपने त्रिशूल से उस बालक का सिर धड़ से अलग कर दिया और घर के अन्दर चले गए।
जब पार्वती जी स्नान करके आईं और उनको बालक गणेश जी के वध के बारे में मालूम हुआ तो वह शोक में विलाप करने लगीं फिर उन्हें भीषण क्रोध आया इससे सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में त्राहिमाम मच गया। तब सभी देवताओं ने मिलकर भगवान शिव से उस बालक को पुनर्जीवित करने की प्रार्थना की।
उसे सुनकर जगत के कल्याण और माँ पार्वती को प्रसन्न करने के लिए भगवान शिव की आज्ञा से उनके गण जंगल में ऐसे प्राणी को ढूँढने निकले जिसका सर सोते हुए उत्तर दिशा की तरफ हो। उन्हें जंगल में एक हाथी का बच्चा उत्तर दिशा की तरफ मुँह करके सोते हुए नज़र आया।
भगवान शिव के सेवक उसे वहाँ से उठा कर शंकर जी के पास ले आये। भोलेनाथ ने उस हाथी के बच्चे का सर सूँड़-समेत काटकर बालक गणेश जी के शरीर से जोड़ दिया।
इस तरह वह बालक फिर से जीवित हो गया चूँकि उनका सर हाथी का था इसलिए सम्पूर्ण जगत में गणपति गणेश जी गजानन के नाम से जाने गए।
भगवान शिवजी ने गणेश जी को तमाम शक्तियां और सामर्थ्य प्रदान करते हुए उन्हें देवताओं में प्रथम पूज्य और समस्त गणों का देव बना दिया।
गणपति जी के जन्म के सम्बन्ध में एक और कथा ब्रह्मवैवर्त पुराण में भी मिलती है। ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार गणपति जी के जन्म के समय शिवलोक में उत्सव मनाया जा रहा था सभी देवता वहाँ शिवधाम पर नन्हे बालक को आशीर्वाद देने के लिए आये, लेकिन शनि देव गणेश जी को देखे बिना ही वापस जाने लगे।
यह देख माता पार्वती जी को आश्चर्य हुआ और उन्होंने शनि देव से इसका कारण पूछा। इस पर शनिदेव ने बताया कि मेरी पत्नी ने मुझे श्राप दिया है कि मैं जिस पर भी दृष्टि डालूंगा, उसका अवश्य ही अमंगल हो जाएगा।
लेकिन मां पार्वती नहीं मानी उन्होंने शनि देव से कहा कि यह संपूर्ण सृष्टि तो ईश्वर के अधीन है। बिना प्रभु की इच्छा से कुछ भी नहीं होता है। अत: तुम निर्भीक होकर मेरे बालक को देखिये और आशीर्वाद दीजिये । माँ पारवती के कहने पर जैसे ही शनि देव ने गणेश जी ओर अपनी द्रष्टि डाली उस बालक का सिर कटकर धड़ से अलग होकर हवा में विलीन हो गया।
गणेश जी की यह दशा देखकर मां पार्वती विलाप करते हुई बेहोश हो गईं। माँ पारवती की ऐसी और देवताओं की प्रार्थना पर भगवान श्री विष्णु जी गरुड़ पर सवार होकर उत्तर दिशा की ओर गए और वहां से एक हाथी के बच्चे का सर जो उत्तर की तरफ मुख करके सोया था लेकर आए। फिर उस सिर को बालक गणेश जी के धड़ से जोड़ दिया। तब से भगवान गणेश गजमुख हो गए और गजानन कहलाने लगे।
आगे हम यह जानेगें कि बालक गणेश जी के कटे हुए सर का क्या हुआ ? आखिर कहाँ पर है उनका असली सर ? इसको जानने के लिए यहाँ पर दिए गए लिंक पर क्लिक करे।
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पंचाग (panchang) का पठन एवं श्रवण अति शुभ माना जाता है इसीलिए भगवान श्रीराम भी पंचाग (panchang) का श्रवण करते थे । जानिए मंगलवार का पंचांग (Mangalvar Ka Panchang)।
शास्त्रों के अनुसार तिथि के पठन और श्रवण से माँ लक्ष्मी की कृपा मिलती है । वार के पठन और श्रवण से आयु में वृद्धि होती है। नक्षत्र के पठन और श्रवण से पापो का नाश होता है। योग के पठन और श्रवण से प्रियजनों का प्रेम मिलता है। उनसे वियोग नहीं होता है । *करण के पठन श्रवण से सभी तरह की मनोकामनाओं की पूर्ति होती है । इसलिए हर मनुष्य को जीवन में शुभ फलो की प्राप्ति के लिए नित्य पंचांग को देखना, पढ़ना चाहिए ।
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हनुमान जी का मंत्र : हं हनुमते रुद्रात्मकाय हुं फट् ।
मित्रो हम पिछले 16 सालो से निरंतर पंचांग बनाते और इसका प्रचार प्रसार करते आ रहे है, अगर आप भी पंचांग को नित्य पढ़ना चाहते है और आप चाहते है कि आपके और दुसरो के पास भी नित्य पंचांग पहुँचता जाय तो कृपया हमारे नंबर 9044862881 को अपने किसी ना किसी ग्रुप से अवश्य ही जोड़ ले ।
कृपया इसे अपना फर्ज / धर्म समझकर, आप इस मैसेज को देखने के बाद इस पोस्ट / पेज का लिंक आगे ज्यादा से ज्यादा लोगो को शेयर करके सहयोग करें , जिससे लोग इस पंचांग के प्रसार – प्रसार में अपना भी बहुमूल्य योगदान दे सकें । ईश्वर अच्छे लोगो का सदैव ही साथ देता है उन पर अपनी कृपा बरसता है ।
आप सभी पर ईश्वर की सदैव असीम कृपा रहे । धन्यवाद
।। आज का दिन मंगलमय हो ।।
दिन (वार) – मंगलवार Mangalwar के दिन क्षौरकर्म अर्थात बाल, दाढ़ी काटने या कटाने से उम्र कम होती है। अत: इस दिन बाल और दाढ़ी नहीं कटवाना चाहिए ।
मंगलवार Mangalwar को हनुमान जी की पूजा और व्रत करने से हनुमान जी प्रसन्न होते है। मंगलवार के दिन हनुमान चालीसा एवं सुन्दर काण्ड का पाठ करना चाहिए।
मंगलवार को यथासंभव मंदिर में हनुमान जी के दर्शन करके उन्हें लाल गुलाब, इत्र अर्पित करके बूंदी / लाल पेड़े या गुड़ चने का प्रशाद चढ़ाएं । हनुमान जी की पूजा से भूत-प्रेत, नज़र की बाधा से बचाव होता है, शत्रु परास्त होते है।
आप बहुत ही सौभाग्य शाली है यदि आपको यह पंचाग नित्य पढ़ने को मिलता है,आप अपने जानने वाले कितने लोगो को जानते है जो नित्य यह पंचांग पढ़ पाते है, आप ईश्वर के प्रिय है जो आपको यह अवसर मिल रहा है,
इसलिए नित्य स्नान आदि के पश्चात सबसे पहले यह पंचाग पढ़े, इस पंचांग को आगे शेयर भी करें और पुण्य कमाएं । नित्य पंचांग को पढ़ने से देवताओं का आशीर्वाद मिलता है, पंचांग को पढ़ने से तीर्थ दर्शन के समान फल मिलता है ।
तिथि :- द्वादशी 14.42 PM तक तत्पश्चात त्रियोदशी तिथि ,
तिथि के स्वामी :- द्वादशी तिथि के स्वामी भगवान श्री विष्णु जी और त्रियोदशी तिथि के स्वामी कामदेव जी है ।
हिंदू पंचाग की बाहरवीं तिथि द्वादशी (Dwadashi) कहलाती है। द्वादशी तिथि के स्वामी भगवान श्री हरि, श्री विष्णु जी है ।
इस तिथि का नाम यशोबला भी है, क्योंकि इस दिन भगवान श्री विष्णु जी / भगवान श्रीकृष्ण जी का आंवले, इलाइची, पीले फूलो से पूजन करने से यश, बल और साहस की प्राप्ति होती है।
द्वादशी को श्री विष्णु जी की पूजा , अर्चना करने से मनुष्य को समस्त भौतिक सुखो और ऐश्वर्यों की प्राप्ति होती है, उसे समाज में सर्वत्र आदर मिलता है, उसकी समस्त मनोकामनाएं निश्चय ही पूर्ण होती है।
द्वादशी तिथि के दिन विष्णु सहस्रनाम का पाठ करना अत्यन्त श्रेयकर होता है। द्वादशी के दिन ॐ नमो भगवते वासुदेवाय मन्त्र की एक माला का जाप अवश्य करें ।
भगवान विष्णु के भक्त बुध ग्रह का जन्म भी द्वादशी तिथि के दिन माना जाता है। इस दिन विष्णु भगवान के पूजन से बुध ग्रह भी मजबूत होता है ।
यदि द्वादशी तिथि सोमवार और शुक्रवार को पड़ती है तो मृत्युदा योग बनाती है। इस योग में शुभ कार्य करना वर्जित है। द्वादशी यदि रविवार के दिन पड़ती है तो क्रकच योग बनाती है, यह अशुभ माना जाता है, इसमें भी शुभ कार्य करना मना किया गया हैं।
लेकिन द्वादशी तिथि जब बुधवार को होती है तो सिद्धा कहलाती है, ऐसे समय में किये गए कार्य कार्य सिद्ध होते है।
द्वादशी तिथि में विष्टि करण होने के कारण इस तिथि को भद्रा तिथि भी कहते है।
द्वादशी तिथि के दिन विवाह, तथा अन्य शुभ कार्य किये जाते है लेकिन इस तिथि में नए घर का निर्माण, ग्रह प्रवेश करना मना किया जाता है ।
द्वादशी के दिन तुलसी तोड़ना निषिद्ध है। द्वादशी के दिन यात्रा नहीं करनी चाहिए, इस दिन यात्रा करने से धन हानि एवं असफलता की सम्भावना रहती है। द्वादशी के दिन मसूर का सेवन वर्जित है।
द्वादशी की दिशा नैऋत्य मानी गई है इस दिन इस दिशा की ओर किए गए कार्य शुभ फल देने वाले माने जाते हैं।
नक्षत्र (Nakshatra) – पुष्य नक्षत्र 16.39 PM तक तत्पश्चात अश्लेषा,
नक्षत्र के देवता, ग्रह स्वामी – पुष्य नक्षत्र के देवता देव गुरु बृहस्पति और स्वामी शनि देव जी है ।
पुष्य नक्षत्र के देवता देव गुरु बृहस्पति और स्वामी शनि देव जी है, इस दिन चंद्र देव कर्क राशि में गोचर करते हैं ।
पुष्य नक्षत्र को नक्षत्रो का राजा भी कहते है, उसमें भी रवि पुष्य नक्षत्र एवं गुरु पुष्य नक्षत्र बहुत ही शुभ माने जाते है। इस अवसर पर किया गया शुभ कार्य अति लाभ दायक और चिरस्थाई होता है।
पुष्य नक्षत्र का नक्षत्र आराध्य वृक्ष: पीपलं तथा नक्षत्र का स्वाभाव शुभ माना जाता है।
शास्त्रों में लिखा है कि पुष्य नक्षत्र में शुरू किये गए सभी कार्य पुष्टिदायक, सर्वथा सिद्ध होते ही हैं, निश्चय ही फलीभूत होते हैं ।
पुष्य नक्षत्र माँ लक्ष्मी जी को अत्यंत प्रिय है । पुष्य नक्षत्र के दिन माँ लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए श्री सूक्त, श्री महा लक्ष्मी अष्टकम का पाठ करना अत्यंत पुण्य दायक माना जाता है।
पुष्य नक्षत्र में जन्मे जातक सुन्दर, शांत, महत्वाकांक्षी, साहसी, सुखी, भोगी, लोकप्रिय, बुद्धिमान, परोपकारी, कड़ी मेहनत करने वाले तथा पुत्र मित्रादि से युक्त होता है।
लेकिन पुष्य नक्षत्र के लोग स्वार्थी, अत्यधिक बोलने वाले, जिद्दी, घमंडी, कट्टरपंथी और अत्यधिक संवेदनशील भी होते हैं।
पुष्य नक्षत्र के लिए भाग्यशाली संख्या 8 और 2, भाग्यशाली रंग लाल, नीला, भाग्यशाली दिन शनिवार, सोमवार और बुधवार होता है ।
पुष्य नक्षत्र में जन्मे जातको को तथा जिस दिन यह नक्षत्र हो उस दिन सभी को “ॐ बृहस्पतये नम: “। मन्त्र का जाप अवश्य करना चाहिए ।
गुरु पुष्य नक्षत्र किसी भी तरह के वस्त्र, वाहन, सोना, चांदी, आभूषण, भूमि और भवन की खरीदारी के लिए उत्तम समय माना गया है ।
आज भाद्रपद माह का प्रदोष ब्रत है, मंगलवार को होने के कारण इसे भौम प्रदोष ब्रत कहा जायेगा ।
प्रदोष तिथि को भगवान भोलेनाथ जी का ब्रत रखा जाता है। मान्यता है कि जो जातक प्रदोष का व्रत रख कर संध्या के समय शंकर जी की आराधना करते हैं उन्हें योग्य जीवन साथी मिलता है, दाम्पत्य जीवन में प्रेम और सहयोग बना रहता है ।
मान्यता है कि इस दिन भगवान शिव के साथ-साथ माता पार्वती का पूजन करने से जीवन में सुख – सौभाग्य की वर्षा होती है, साथ ही जातक के सभी संकट दूर हो जाते हैं । ।
प्रदोष व्रत में सूर्यास्त से लगभग 45 मिनट पहले और सूर्यास्त के 45 मिनट बाद तक पूजा करने का विशेष महत्त्व है । इस दिन सम्पूर्ण शिव परिवार का पूजन करने से भगवान शिव अपने भक्त पर बहुत प्रसन्न होते है ।
प्रदोष व्रत को महिलाएं अखंड सौभाग्य की प्राप्ति के लिए रखती हैं।प्रदोष ब्रत रखने वाले जातक के पूरे परिवार पर भगवान भोलनाथ और माँ पार्वती की सदैव असीम कृपा बनी रहती है ।
प्रदोष ब्रत के दिन शिव पंचाक्षर मन्त्र ॐ नम: शिवाय तथा
महामृत्युंजय मन्त्र :- ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥ का जाप करने से सहस्त्र गुना पुण्य की प्राप्ति होती है ।
प्रदोष को प्रदोष कहने के शास्त्रों में एक मिलती है। माना जाता है कि एक बार चंद्र देव को क्षय रोग हो गया, जिसके कारण उन्हें बहुत कष्ट हो रहा था।
अपने रोग के निवारण के लिए चंद्र देव जी भगवान शिव के पास गए, प्रभु ने चंद्र देव के क्षय रोग का निवारण त्रयो करके उन्हें त्रियोदशी के दिन ही पुन:जीवन प्रदान किया था तभी से इस दिन को प्रदोष कहा जाने लगा है ।
प्रदोष व्रत में फलाहार किया जाता है इस व्रत में अन्न, चावल, लाल मिर्च, सादा नमक का प्रयोग नहीं करना चाहिए।
योग :- परिधि 12.40 AM बुधवार 9 सितम्बर तक
योग केस्वामी:- परिध योग की स्वामी विश्वकर्मा जी एवं स्वभाव हानिकारक माना जाता है ।
प्रथम करण : – तैतिल 14.42 PM तक
करण के स्वामी, स्वभाव :- तैतिल करण के स्वामी विश्वकर्मा जी और स्वभाव सौम्य है ।
द्वितीय करण : – गर 01.35 बुधवार 9 सितम्बर तक
करण के स्वामी, स्वभाव :- गर करण के स्वामी भूमि तथा स्वभाव सौम्य है । ।
ब्रह्म मुहूर्त : 04.31 AM से 5.17 AM तक
विजय मुहूर्त : 14.24 PM से 15.14 PM तक
गोधूलि मुहूर्त : 18.35 PM से 18.58 PM तक
अमृत काल : 10.40 AM से 12.10 PM तक
शिव वास :- नंदी पर 14.42 PM तक तत्पश्चात भोजन में
शिव वास :- जब भगवान भोलेनाथ नन्दी जी पर विराजमान होते हैं, तो उस समय रुद्र अभिषेक करना सदैव बहुत ही शुभ माना जाता है। शास्त्रों केअनुसार भगवान शंकर जी के नन्दी पर विराजमान के समय रूद्र अभिषेक करने से सर्वत्र सफलता, शुभ समाचारो की प्राप्ति होती है।
शिव वास : भोजन में जब भगवान भोलेनाथ जी भोजन कर रहे हों या ध्यान में मग्न हों तो उस समय रुद्र अभिषेक करना अशुभ माना जाता है। भगवान शंकर जी के रात्रि भोजन अथवा ध्यान करते समय रुद्रभिषेक करने से परेशानी का सामना करना पड़ता है।
अग्नि वास : पृथ्वी पर
अग्निवास जब पृथ्वी पर होता है तो बहुत ही शुभ माना जाता है । शास्त्रों के अनुसार पृथ्वी पर अग्निवास होने पर हवन आदि करने से सुख सौभाग्य की प्राप्ति होती है, मनवांछित लाभ मिलता है ।
दिशाशूल (Dishashool)- मंगलवार को उत्तर दिशा का दिकशूल होता है।
यात्रा, कार्यों में सफलता के लिए घर से गुड़ खाकर जाएँ ।
गुलिक काल : – दोपहर 12:00 से 01:30 तक है ।
राहुकाल (Rahukaal) दिन – 3:00 से 4:30 तक।
सूर्योदय – प्रातः 06:02
सूर्यास्त – सायं 18:35
विशेष – द्वादशी के दिन तुलसी तोड़ना, मसूर का सेवन करना वर्जित है।
द्वादशी के दिन यात्रा नहीं करनी चाहिए, इस दिन यात्रा करने से धन हानि एवं असफलता की सम्भावना रहती है ।
त्रियोदशी को बैगन नहीं खाना चाहिए , त्रियोदशी को बैगन खाने से पुत्र को कष्ट मिलता है ।
“हे आज की तिथि (तिथि के स्वामी), आज के वार, आज के नक्षत्र (नक्षत्र के देवता और नक्षत्र के ग्रह स्वामी ), आज के योग और आज के करण, आप इस पंचांग को सुनने और पढ़ने वाले जातक पर अपनी कृपा बनाए रखे, इनको जीवन के समस्त क्षेत्रो में सदैव हीं श्रेष्ठ सफलता प्राप्त हो “।
आप का आज का दिन अत्यंत मंगल दायक हो ।
8 सितम्बर 2026 का पंचांग, 8 September 2026 ka panchang, mangalwar ka panchang, aaj ka panchang, aaj ka rahu kaal, aaj ka shubh panchang,mangalwar ka rahu kaal, mangalwar ka shubh panchang, panchang, tuesday ka panchang, tuesday ka rahu kaal, आज का पंचांग, मंगलवार का पंचांग, आज का राहुकाल, आज का शुभ पंचांग, ट्यूसडे का पंचांग, ट्यूसडे का राहुकाल, पंचांग, मंगलवार का राहु काल, मंगलवार का शुभ पंचांग,
Suneel Pardal Panchang & Vastu Consultant
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सोमवार का पंचांग, Somwar Ka Panchang, 14 सितम्बर 2026 का पंचांग, 14 September 2026 ka Panchang,
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आप सभी पर ईश्वर की सदैव असीम कृपा रहे । धन्यवाद
Panchang, पंचाग, आज का पंचांग, aaj ka panchang, ( Panchang 2026, हिन्दू पंचाग, Hindu Panchang ) पाँच अंगो के मिलने से बनता है, ये पाँच अंग इस प्रकार हैं :-
पंचाग (panchang) का पठन एवं श्रवण अति शुभ माना जाता है इसीलिए भगवान श्रीराम भी पंचाग (panchang) का श्रवण करते थे । जानिए, सोमवार का पंचांग, Somvar Ka Panchang।
सोमवार का पंचांग, Somvar Ka Panchang,
14 सितम्बर 2026 का पंचांग, 14 September 2026 ka Panchang,
दिन (वार) – सोमवार के दिन क्षौरकर्म अर्थात बाल, दाढ़ी काटने या कटाने से पुत्र का अनिष्ट होता है शिवभक्ति को भी हानि पहुँचती है अत: सोमवार को ना तो बाल और ना ही दाढ़ी कटवाएं ।
सोमवार के दिन भगवान शंकर की आराधना, अभिषेक करने से चन्द्रमा मजबूत होता है, काल सर्प दोष दूर होता है।
सोमवार का व्रत रखने से मनचाहा जीवन साथी मिलता है, वैवाहिक जीवन में लम्बा और सुखमय होता है।
जीवन में शुभ फलो की प्राप्ति के लिए हर सोमवार को शिवलिंग पर पंचामृत या मीठा कच्चा दूध एवं काले तिल चढ़ाएं, इससे भगवान महादेव की कृपा बनी रहती है परिवार से रोग दूर रहते है।
सोमवार के दिन शिव पुराण के अचूक मन्त्र “श्री शिवाये नमस्तुभ्यम’का अधिक से अधिक जाप करने से समस्त कष्ट दूर होते है. निश्चित ही मनवाँछित लाभ मिलता है।
*विक्रम संवत् – 2083, * शक संवत – 1948, *कलि संवत – 5128 *कलयुग – 5128 वर्ष * अयन – दक्षिणायण, * ऋतु – वर्षा ऋतु, * मास – भाद्रपद माह, * पक्ष – शुक्ल पक्ष *चंद्र बल – मेष, वृषभ, सिंह, तुला, धनु, मकर,
सोमवार को चन्द्रमा की होरा :-
प्रात: 6.05 AM से 7.07 AM तक
दोपहर 01.18 PM से 2.20 PM तक
रात्रि 20.24 PM से 21.22 PM तक
सोमवार को चन्द्रमा की होरा में अधिक से अधिक चन्द्र देव के मन्त्र का जाप करें। यात्रा, प्रेम,प्रसन्नता, कला सम्बन्धी कार्यो के लिए चन्द्रमा की होरा अति उत्तम मानी जाती है।
आप बहुत ही सौभाग्य शाली है यदि आपको यह पंचाग नित्य पढ़ने को मिलता है,भारत की लगभग 150 करोड़ की आबादी में 0.001 % अर्थात लगभग 15 हज़ार आदमी ही नित्य पंचांग पढ़ पाते है।
आप पर ईश्वर की असीम कृपा है जो आपको नित्य पंचांग पढ़ने का, अपने भाग्य को प्रबल करने का, पापो के प्रायश्चित करने का अवसर मिल रहा है,
दुनिया के सारे उपाय एक तरफ है, और नित्य पंचाग पढ़ने का पुण्य उससे भी कहीं अधिक है,नित्य पंचांग पढ़ने से देवताओं का आशीर्वाद मिलता है, कार्य सिद्ध होने लगते है,
इसलिए नित्य स्नान आदि के पश्चात सबसे पहले यह पंचाग पढ़े, इस पंचांग को आगे शेयर भी करें और पुण्य कमाएं । पंचांग को पढ़ने से यज्ञ करने के बराबर फल मिलता है ।
सोमवार के दिन चन्द्रमा की होरा में चंद्रदेव के मंत्रो का जाप करने से कुंडली में चंद्र देव मजबूत होते है, पूरे दिन शुभ फलो की प्राप्ति होती है ।
चन्द्रमा के मन्त्र
ॐ सों सोमाय नम:।
ॐ श्रीं श्रीं चन्द्रमसे नम: ।
तिथि (Tithi) – तृतीया 07.06 AM तक तत्पश्चात चतुर्थी तिथि,
तिथि का स्वामी – तृतीया तिथि के स्वामी माँ गौरी और कुबेर देव जी और चतुर्थी तिथि के स्वामी भगवान गणपति गणेश जी है ।
तृतीया: किसी भी पक्ष की तीसरी तारीख को तृतीया तिथि या तीज कहते है। तृतीया तिथि को जया तिथि भी कहा गया है।
अपने नाम के अनुसार ही यह तिथि सभी शुभ कार्यों में जय दिलाने अर्थात सफलता दिलाने वाली कही गई है। लेकिन बुधवार को तृतीया तिथि होने से मृत्युदा कहलाती है, इसलिए बुधवार की तृतीया को कोई भी नया कार्य शुरु करना शुभ नहीं माना जाता है।
तृतीया तिथि में माँ गौरी जी की पूजा अर्चना करने से जीवन में सुख सौभाग्य की वृद्धि होती है। तृतीया के दिन माँ गौरी का ध्यान करते हुए उन्हें दूध की मिठाई, फूल और चावल अर्पित करें एवं श्रद्धानुसार घी का दीपक जलाकर ’’ऊँ गौर्ये नमः’’ की एक माला का अवश्य ही जाप करें ।
कुबेर जी भी तृतीया तिथि के स्वामी माने गये हैं। शास्त्रों के अनुसार कुबेर जी देवताओं के कोषाध्यक्ष है अतः इस दिन इनकी भी पूजा करने से जातक को विपुल धन-धान्य, समृद्धि और ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है।
कुबेर देव Kuber dev धन सम्पदा की दिशा उत्तर के लोकपाल हैं। ये भूगर्भ के भी स्वामी कहे गए हैं।
जैसे देवताओं के गुरु बृहस्पति और राजा इन्द्र कहे गए है उसी प्रकार सम्पूर्ण ब्राह्मांडों के धनाधिपति कुबेर देव कहे गए है।
कुबेर देव के पिता विश्रवा तथा माता का नाम इडविडा हैं ।
कुबेर देव की पत्नी का नाम देवी श्रद्धा तथा दोनों पुत्रों के नाम ‘नल कुबेर’ व ‘नील ग्रीव’ है ।
कुबेर देव रावण के सौतेले भाई है और या भगवान शिव जी के प्रिय सेवक , परम मित्र भी माने जाती है। घर में कुबेर देवता की फोटो को उत्तर दिशा की ओर लगाना चाहिए और इस दिशा को बिलकुल साफ रखना चाहिए ।
शास्त्रों के अनुसार जो भी जातक किसी भी पक्ष की तृतीया को घी का दीपक जलाकर नियम से नीचे दिए गए कुबेर मंत्र का जप दक्षिण दिशा की ओर मुख करके करता है उसे कुबेर देव की कृपा अवश्य ही प्राप्त होती है, उसे अपने कार्यक्षेत्र , व्यापार में आशातीत सफलता मिलती है।
कुबेर मंत्र: “ऊँ श्रीं, ऊँ ह्रीं श्रीं, ह्रीं क्लीं श्रीं क्लीं वित्तेश्वराय: नम:”। यदि इस मंत्र का जप किसी शिव मंदिर में अथवा बिल्वपत्र वृक्ष की जड़ों के समीप बैठकर करा जाये तो या बहुत अधिक उत्तम होता है, उस जातक को भगवान भोलेनाथ और कुबेर जी दोनों की पूर्ण कृपा प्राप्त होती है ।
तृतीया को परवल का सेवन नहीं करना चाहिए, तृतीया को परवल का सेवन करने से शत्रुओं में वृद्धि होती है ।
आज भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी अति शुभ गणेश चतुर्थी का पर्व है । पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि पर भगवान गणेश का जन्म हुआ था इसीलिए भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को भगवान गणेश का जन्मोत्सव विधि-विधान और धूम-धाम के साथ मनाया जाता है।
वास्तव में गणेश उत्सव का पर्व पूरे हर्ष और उल्लास के साथ भाद्र माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी से चतुर्दशी / अनंत चतुर्दशी तक 10 दिनों तक बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। इन दस दिनों में विघ्ननाशक भगवान गणेश की विशेष पूजा की जाती है।
गणेश चतुर्थी / गणेश उत्सव में भक्त गण पूर्ण श्रद्धा और अपने सामर्थ्य के अनुसार अपने घर / प्रतिष्ठान में भगवान गणपति की स्थापना करते है या इन दिनों प्रभु गजानन की पूजा अर्चना करते है ।
गणेशजी को किसी भी शुभ कार्य के आरंभ में स्मरण किया जाता है—
वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ। निर्विघ्नं कुरु मे देव शुभकार्येषु सर्वदा॥
भावार्थ: हे विशाल स्वरूप वाले, करोड़ों सूर्यों के समान तेजस्वी गणेशजी! मेरे सभी शुभ कार्यों को सदैव विघ्नरहित करें।
वर्ष 2026 में गणेश चतुर्थी की शुरुआत 14 सितम्बर सोमवार से हो रही है जिसका समापन 25 सितंबर 2026 को अनंत चतुर्दशी के दिन किया जाएगा ।
गणेश जी की स्थापना का शुभ मुहूर्त, आज सोमवार 14 सितम्बर को सुबह 11 बजकर 42 मिनट से लेकर दोपहर 12 बजकर 24 मिनट तक रहेगा, एवं
दोपहर 01 बजकर 40 मिनट से लेकर सांय 06 बजकर 02 मिनट तक का समय गणपति जी की मूर्ति की स्थापना के लिए शुभ मुहूर्त रहेगा। आप इस अवधि में गणपति जी की मूर्ति की स्थापना कर सकते हैं।
गणेशजी से संबंधित कथाएँ और महात्म्य विशेष रूप से गणेश अथर्वशीर्ष, गणेश पुराण और मुद्गल पुराण में मिलते हैं। इनके अतिरिक्त विभिन्न पुराणों तथा स्मृति-परंपरा में भी गणपति की पूजा और उनके विघ्नहर्ता स्वरूप का उल्लेख मिलता है।
घर में बैठे हुए गणेश जी Ganesh ji और कार्यस्थल पर खड़े गणपतिजी का चित्र लगाना ही हितकर होता है। लेकिन ये ध्यान रखें कि गणेशजी Ganesh ji के दोनों पैर जमीन का स्पर्श करते हुए हों, ताकि कार्य में स्थिरता आए।
गणेश जी की स्थापना करते, उनकी पूजा आराधना करते समय घी का दीपक जलाकर मूर्ति पर सिंदूर / रोली से तिलक करते हुए उनकी मूर्ति पर 11 /21 / 51 /101 दूर्वा चढ़ाएँ । इन दिनों भगवान गजानन को नित्य मोदक / गुड़ या बूंदी के लड्डुओं का भी भोग लगाएं। लेकिन ध्यान रखें कि उन्हें तुलसी कतई ना चढ़ाएँ ।
गणेश जी की पूजा में लाल फूल और शमी पत्र चढ़ाना चाहिए । गणेश जी को सफ़ेद चन्दन और गेंदे का फूल भी नहीं चढ़ाना चाहिए ।
सबसे अंत में सभी गलतियों की छमा याचना करते हुए भगवान को प्रणाम करना चाहिए। गणपति का पूजन शुद्ध आसन पर बैठकर अपना मुख पूर्व अथवा उत्तर दिशा की तरफ करके करें।
गणेश चतुर्थी Ganesh Chaturthi के 10 दिनों में प्रातः एवं संध्या के समय गणेश चालीसा, गणेश स्तुति, श्रीगणेश सहस्रनामावली, गणेश जी Ganesh ji की आरती, संकटनाशन गणेश स्तोत्र आदि का पाठ करें।
गणेश चतुर्थी के दिन सभी को बहुत ही सात्विक रहना चाहिए । इस दिन विघ्हर्ता गणपति जी पृथ्वी पर अपने भक्तो के दुःख हरने, उनके समस्त संकटो को दूर करने, उनके जीवन को हर्ष – उल्लास, सुख – समृद्धि से भरने के लिए आते है अत: इन दिनों बहुत ही श्राद्ध और प्रेम पूर्वक गणेश जी की आराधना करनी चाहिए ।
मान्यता है कि गणेश उत्सव के इन 10 दिनों में घर आये अतिथियों का बहुत ही आदर, सत्कार करना चाहिए इससे ग्रह दोषो का निवारण होता है, जीवन में शुभ समय आता है ।
आज विनायक चतुर्थी तिथि है। प्रत्येक माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को विनायक चतुर्थी कहते है । चतुर्थी तिथि के स्वामी देवताओं में प्रथम पूज्य, भगवान शिव और माता पार्वती के सबसे छोटे पुत्र भगवान गणेश जी माने गए हैं।
इस दिन भगवान गणेश की पूजा अर्चना से निश्चय ही समस्त मनोवाँछित फलो की प्राप्ति होती है।
अमावस्या के बाद आने वाली चतुर्थी को विनायक चतुर्थी तो पूर्णिमा के बाद आने वाली चतुर्थी को संकष्टी चतुर्थी कहा जाता है। विनायक चतुर्थी के दिन गणेश जी की पूजा दोपहर के समय में की जाती है ।
मान्यता है कि किसी भी कार्य के प्रारम्भ में विघ्हर्ता की पूजा आराधना करने से सभी ग्रह दोष शांत होते है ।
चतुर्थी को गणपित जी को रोली का तिलक लगाकर, दूर्वा अर्पित करके, लड्डुओं या गुड़ का भोग लगाकर “ॐ गण गणपतये नम:” मन्त्र की एक माला का जाप अवश्य करें ।
गणेश जी को मोदक / लड्डू, लाल रंग के फूल, दुर्वा (दूब), शमी-पत्र, और केला अति प्रिय है, बुधवार और चतुर्थी को गजानन को यह वस्तुएं अर्पित करने से जीवन में शुभ समय आता है ।
चतुर्थी को गणेश जी की आराधना से किसी भी कार्य में विघ्न नहीं आते है, कार्यो में श्रेष्ठ सफलता मिलती है ।
चतुर्थी को गणेश जी के परिवार के सदस्यों के नामो का स्मरण, उच्चारण करने से भाग्य चमकता है, शुभ समय आता है ।
चतुर्थी तिथि को रिक्ता तिथि कहते है इस दिन शुभ कार्यो का प्रारम्भ शुभ नहीं समझा जाता है ।
किसी भी पक्ष की चतुर्थी तिथि में मूली और बैंगन का सेवन करना मना है। चतुर्थी को मूली खाने से धन का नाश होता है, और चतुर्थी को बैगन खाने से रोग बढ़ते है ।
नक्षत्र (Nakshatra) – चित्रा 13.55 PM तक तत्पश्चात स्वाति
नक्षत्र के देवता, ग्रह स्वामी- चित्रा नक्षत्र के देवता विश्वकर्मा जी एवं चित्रा नक्षत्र के स्वामी मंगल देव जी है ।
चित्रा नक्षत्र नक्षत्र मंडल में उपस्थित 27 नक्षत्रों में 14 वां है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार, चित्रा नक्षत्र का शासक ग्रह चंद्र देव जी है।
यह एक मोती या उज्ज्वल गहने की तरह है जो चमकते प्रकाश सा हमारे भीतर की आत्मा का प्रतीक है। 27 नक्षत्रों में चित्रा नक्षत्र सबसे ज्यादा चमकने वाला नक्षत्र भी बताया जाता है ।
चित्रा नक्षत्र कलात्मकता, रचनात्मकता का प्रतीक है, इसीलिए इस नक्षत्र के लोग अपने क्षेत्र में बहुत ही प्रवीण होते है वह साधारण चीज़ को भी और भी अधिक खूबसूरत, विशेष बनाते है, उसके मूल्य को बढ़ा देते हैं।
चित्रा नक्षत्र में जन्म लेने वाले पुरुष बहुत मेहनती होते हैं। इसके बावजूद सफलता प्राप्त करने में इन्हें 32 साल की उम्र तक संघर्ष करना पड़ता है।
इस नक्षत्र का आराध्य वृक्ष : बेल तथा स्वाभाव तीक्ष्ण माना गया है। चित्रा नक्षत्र स्टार का लिंग मादा है।
चित्रा नक्षत्र के लिए भाग्यशाली संख्या 5, 6 और 9, भाग्यशाली रंग, काला, भाग्यशाली दिन रविवार और बुधवार माना जाता है ।
चित्रा नक्षत्र में जन्मे जातको को तथा जिस दिन यह नक्षत्र हो उस दिन सभी को “ॐ चित्रायै नमः”l। मन्त्र माला का जाप अवश्य करना चाहिए ।
योग केस्वामी:- ब्रह्म योग के स्वामी अश्विनी कुमार जी एवं स्वभाव श्रेष्ठ माना जाता है ।।
प्रथम करण : – गर 07.06 AM तक
करण के स्वामी, स्वभाव :- गर करण के स्वामी भूमि तथा स्वभाव सौम्य है ।
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द्वितीय करण : – वणिज 19.20 PM तक तत्पश्चात विष्टि
करण के स्वामी, स्वभाव :- वणिज करण की स्वामी लक्ष्मी देवी और स्वभाव सौम्य है ।
ब्रह्म मुहूर्त : 4.32 AM से 5.19 AM तक
विजय मुहूर्त : 14.20 PM से 15.10 PM तक
गोधूलि मुहूर्त : 18.28 PM से 18.51 PM तक
अमृत काल :- 07.18 AM से 08.57 AM तक
शिव वास :- सभा में 07.06 AM तक तत्पश्चात क्रीड़ा में
शिव वास जब सभा में होता है अर्थात जब भगवान शंकर अपनी सभा में होते हैं, तो उस सामान्य रुद्र अभिषेक करना अशुभ माना जाता है। शास्त्रों के अनुसार शिव के सभा में होने पर रूद्र अभिषेक करने से दुःख का सामना करना पड़ सकता है।
जब भगवान शंकर जी क्रीड़ा में होते हैं, तो उस समय भी रुद्र अभिषेक करना अशुभ माना जाता है। शास्त्रों के अनुसार भगवान भोलेनाथ जी के कार्य अथवा क्रीड़ा के समय रूद्र अभिषेक करने से जीवन में तरह तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है।
अग्निवास : पाताल में 07.06 AM तक तत्पश्चात पृथ्वी पर
जब पाताल में अग्नि वास है तो वह हवन से सम्बन्धित अनुष्ठानों के लिये शुभ नहीं मानी जाती है, यह अशुभ मानी गई है । अग्नि के पाताल वास के दौरान किये जाने वाले हवन सम्बन्धित अनुष्ठानों व्यक्ति को आर्थिक नुकसान करना पड़ता है उसका धन नष्ट हो सकता है।
अग्निवास जब पृथ्वी पर होता है तो बहुत ही शुभ माना जाता है । शास्त्रों के अनुसार पृथ्वी पर अग्निवास होने पर हवन आदि करने से सुख सौभाग्य की प्राप्ति होती है, मनवांछित लाभ मिलता है ।
दिशाशूल (Dishashool)- सोमवार को पूर्व दिशा का दिशा शूल होता है ।
यात्रा, कार्यों में सफलता के लिए घर से दर्पण देखकर, दूध पीकर जाएँ ।
“हे आज की तिथि ( तिथि के स्वामी ), आज के वार, आज के नक्षत्र ( नक्षत्र के देवता और नक्षत्र के ग्रह स्वामी ), आज के योग और आज के करण, आप इस पंचांग को सुनने और पढ़ने वाले जातक पर अपनी कृपा बनाए रखे, इनको जीवन के समस्त क्षेत्रो में सदैव हीं श्रेष्ठ सफलता प्राप्त हो “।
आप का आज का दिन अत्यंत मंगल दायक हो ।
अपने धर्म, अपनी संस्कृति अपने नैतिक मूल्यों के प्रचार, प्रसार के लिए तन – मन – धन से अपना बहुमूल्य सहयोग करें । आप हमें अपनी इच्छा – सामर्थ्य के अनुसार सहयोग राशि 6306516037 पर Google Pay कर सकते है । आप पर ईश्वर की असीम अनुकम्पा की वर्षा होती रहे ।
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Ganesh Utsav, Ganesh Chaturthi, श्री गणेश उत्सव, गणेश चतुर्थी 2026,
* गणेश उत्सव Ganesh Utsav हिन्दुओं का एक प्रमुख पर्व है जो कि भाद्र माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी से 10 दिनों तक बड़े धूम- धाम से मनाया जाता है। इन दस दिनों में विघ्ननाशक भगवान गणेश की विशेष पूजा का विधान है।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि पर भगवान गणेश का जन्म हुआ था इसीलिए भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को भगवान गणेश का जन्मोत्सव विधि-विधान और धूम-धाम के साथ मनाया जाता है।
बहुत ही भाग्यशाली होते है वह लोग जो गणेश चतुर्थी Ganesh Chaturthi / गणेशउत्सव GaneshUtsav में पूर्ण श्रद्धा और अपने सामर्थ्य के अनुसार अपने घर / प्रतिष्ठान में भगवान गणपति की स्थापना करते है या इन दिनों नित्य प्रभु गजानन की पूजा अर्चना करते है ।
*गणेश पुराण के अनुसार गणेश उत्सव Ganesh Utsav / गणेश चतुर्थी Ganesh Chaturthi में भगवान गणपति जी की पूर्ण श्रद्धा से विधिपूर्वक पूजा करने से गणेश जी की अपने भक्तों के सारे कष्ट, अनेक सारे संकट हर लेते है उसकी समस्त मनोकामनाए पूर्ण करते है।
* शास्त्रो के अनुसार भाद्रपद माह में शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को मध्याह्न में भगवान गणेश जी का जन्म हुआ था । भगवान गणेश का जन्म मध्याह्न काल में होने के कारण ही गणेश पूजा के लिये मध्याह्न ( दोपहर ) के समय को सर्वाधिक उपयुक्त माना जाता है।
* गणेश चतुर्थी Ganesh Chaturthi के दिन, भगवान गणेश जी की स्थापना और गणेश जी की विधिवत पूजा, मध्याह्न के दौरान की जानी चाहिये, तभी श्रेष्ठ फलो की प्राप्ति होती है।
वर्ष 2026 में गणेश चतुर्थी की शुरुआत 14 सितम्बर सोमवार से हो रही है जिसका समापन 25 सितंबर 2026 अनंत चतुर्दशी के दिन किया जाएगा ।
शास्त्रों के अनुसार गणेश जी का जन्म दोपहर के समय हुआ था इसलिए गणेश चतुर्थी के दिन गणपति जी की आराधना दोपहर में ही करनी चाहिए
गणेश चतुर्थी शुभ मुहूर्त (Ganesh Chaturthi Shubh Muhurat):
चतुर्थी तिथि प्रारम्भ : 14 सितम्बर सोमवार 2026 को प्रात : 7 बजकर 06
चतुर्थी तिथि समाप्त : 15 सितम्बर मंगलवार को प्रात : 07 बजकर 44 मिनट तक
गणेश चतुर्थी व्रत : 14 सितम्बर सोमवार,2026
गणेश पूजा / स्थापना का शुभ मुहूर्त –
14 सितम्बर सोमवार, को सुबह 11 बजकर 42 मिनट से लेकर दोपहर 12 बजकर 24 मिनट तक रहेगा, एवं
दोपहर 01 बजकर 40 मिनट से लेकर सांय 06 बजकर 02 मिनट तक का समय गणपति जी की मूर्ति की स्थापना के लिए शुभ मुहूर्त रहेगा। आप इस अवधि में गणपति जी की मूर्ति की स्थापना कर सकते हैं।
गणेश विसर्जन की तिथि – 25 सितंबर 2026 को अनंत चतुदर्शी के दिन
इस बार गणेश चतुर्थी पर प्रीति योग, सर्वार्थ सिद्धि, रवि योग के साथ इंद्र-ब्रह्म योग का भी शुभ संयोग बना रहेगा। इस दिन कर्क राशि में बुध और शुक्र के होने से अति शुभ लक्ष्मी नारायण योग का भी निर्माण हो रहा है । इसके अतिरिक्त गणेश चतुर्थी पर बुधवार का महासंयोग भी अति कल्याणकारी है ।
गणपति स्थापना / आराधना
* गणेश चतुर्थी Ganesh Chaturthi के दिन बहुत से लोग अपने अपने घरों में भगवान गणेश जी Ganesh ji की नई मूर्ति को स्थापित करते हैं एवं अंतिम दिन गणेश प्रतिमा का विसर्जन कर दिया जाता है। गणेश चतुर्थी Ganesh Chturthi के दिन एक विशेष विधि से गणेश प्रतिमा को स्थापित किया जाता है।
* घर में बैठे हुए गणेश जी Ganesh ji और कार्यस्थल पर खड़े गणपतिजी का चित्र लगाना ही हितकर होता है। लेकिन ये ध्यान रखें कि गणेशजी Ganesh ji के दोनों पैर जमीन का स्पर्श करते हुए हों, ताकि कार्य में स्थिरता आए।
* गणेश चतुर्थी Ganesh Chaturthi के दिन सूर्योदय से पूर्व उठकर दूध / पंचामृत / गंगा जल से स्नान आदि करके शुद्ध लाल रंग के वस्त्र पहनाएं, श्री गणेश जी को लाल रंग के वस्त्र पहनाना अति शुभ माना जाता है।
* श्री गणेश जी की प्रतिमा / फोटो ईशाण कोण में अथवा उत्तर दिशा में इस तरह स्थापित करें कि उनका श्री मुख पश्चिम दिशा की ओर रहे । गणेश जी की मूर्ति चित्र स्थापित करते समय नीचे लाल रंग का नया कपड़ा बिछाकर उस पर फूलो का आसान तैयार करें फिर उसके ऊपर गणपति जी की मूर्ति अथवा चित्र स्थापित करें । स्थापना / पूजा के दौरान “गं गणपतये नमः” मंत्र का जाप करना चाहिए।
* स्थापना के पश्चात सर्वप्रथम भगवान श्री गणेश को पंचामृत से स्नान कराकर शुध्द जल से स्नान कराएं, तत्पश्चात रोली से तिलक करके भीगे अक्षत, दूर्वा, शमी पत्र, लाल फूल, घी, मोदक के लड्डू, नारियल, पंचमेवा, शहद, पान, अर्पित करके उनकी पूजा आराधना करें ।
* गणेशजी Ganesh ji की पूजा आराधना करते समय घी का दीपक जलाकर मूर्ति पर सिंदूर / रोली से तिलक करते हुए उनकी मूर्ति पर 11 /21 / 51 /101 दूर्वा चढ़ाएँ । इन दिनों भगवान गजानन को नित्य मोदक / गुड़ या बूंदी के लड्डुओं का भी भोग लगाएं। लेकिन ध्यान रखें कि उन्हें तुलसी कतई ना चढ़ाएँ ।
* गणेश जी Ganesh ji की पूजा करते समय उन्हें पान के पत्ते और सुपारी भी चढ़ानी चाहिए और हल्दी, कुमकुम और दक्षिणा भी रखनी चाहिए। गणेश जी Ganesh ji को लाल फूल बहुत पसंद है अत: उनकी पूजा में लाल फूल, और शमी पत्र चढ़ाना चाहिए । गणेश जी को सफ़ेद चन्दन और गेंदे का फूल भी नहीं चढ़ाना चाहिए ।
* गणेश जी Ganesh ji को श्री फल या नारियल चढ़ाते हुए 21 लड्डुओं का भोग भी लगाना चाहिए, जिसे पूजा के बाद प्रशाद के रूप में बाँट दें, फिर कपूर जलाकर उनकी आरती करें।
* सबसे अंत में सभी गलतियों की छमा याचना करते हुए भगवान को प्रणाम करना चाहिए। गणपति का पूजन शुद्ध आसन पर बैठकर अपना मुख पूर्व अथवा उत्तर दिशा की तरफ करके करें।
गणेश चतुर्थी Ganesh Chaturthi के 10 दिनों में प्रातः एवं संध्या के समय गणेश चालीसा, गणेश स्तुति, श्रीगणेश सहस्रनामावली, गणेश जी Ganesh ji की आरती, संकटनाशन गणेश स्तोत्र आदि का पाठ करें।
गणेश चतुर्थी के दिन सभी को बहुत ही सात्विक रहना चाहिए । इस दिन विघ्हर्ता गणपति जी पृथ्वी पर अपने भक्तो के दुःख हरने, उनके समस्त संकटो को दूर करने, उनके जीवन को हर्ष – उल्लास, सुख – समृद्धि से भरने के लिए आते है अत: इन दिनों बहुत ही श्राद्ध और प्रेम पूर्वक गणेश जी की आराधना करनी चाहिए ।
मान्यता है कि गणेश उत्सव के इन 10 दिनों में घर आये अतिथियों का बहुत ही आदर, सत्कार करना चाहिए इससे ग्रह दोषो का निवारण होता है, जीवन में शुभ समय आता है ।
Published By : Memory Museum Updated On : 2025-08-24 12:00:00 PM
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