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सत्कर्मों का महत्व


जैसे करोड़ों अरबों बूंदे मिलकर एक बड़े तालाब झील का सर्जन करती है वैसे ही मनुष्य का लगातार सत्कर्म करते रहना उसके तथा उसके वंश के लिये बहुत बड़ी सम्पत्ति और चिरस्थायी यश का रूप धारण कर लेता है। सदैव याद रखे यदि आप पापकर्म करते है तो उसका प्रभाव आप तथा आपके परिवार और भावी वंश पर अवश्य ही पड़ेगा तथा यही बात सत्कर्म करने पर भी लागू होती है। हो सकता है आपको आपके कर्मों के फल का लाभ तुरन्त नहीं हो परन्तु वह सर्वशक्तिमान ईश्वर जो कण-कण, घट-घट में व्याप्त है हमारी हर सोच तथा क्रियाकलाप पर उसकी निगाह है, उसी के अनुसार वह हमें फल प्रदान करता है, इसीलिये अब से जो भी कार्य करें, स्मरण रहे कि उसका फल, उसका भोग, मात्र हमें ही नही वरन् हमारे पूरे परिवार तथा वंश को भी मिलेगा। अच्छे कर्मों के अच्छे फल बहुत धीरे-धीरे मिलते है पर मिलते लम्बे समय तक है। कर्मों तथा उसके प्रतिफल का यह सिलसिला व्यक्ति के सात जन्म तथा अलग-अलग सात पीढ़ियों तक चलता है।

हम मुनष्यों को ईश्वर का स्वरूप पता नही है वह स्त्री है या पुरूष, लम्बे है या नाटे, गोरे है या काले, मोटे है या दुबले हमें नही मालूम है लेकिन हम जैसी कल्पना करते है वह सर्वशक्तिमान ईश्वर वैसा ही प्रतीत होता है। उन्हें कोई गणेश जी, कोई शिवजी, कोई कृष्ण, कोई भगवान राम, कोई दुर्गा जी, कोई अल्लाह, कोई ईसा मसीह, कोई गुरूनानक देव, कोई भगवान महावीर जी और कोई भगवान बुद्ध के रूप में पूजता है और उसी रूप में ध्यान करता है।

ईश्वर सत्य एवं न्याय का रूप है वह अपने भक्तों पर सदैव स्नेह, उनकी रक्षा एवं पापियों को उनके पाप के अनुसार दंडित करते है। सभी धर्मों में कहा गया है कि हमारे सारे बुरे तथा अच्छे कर्मों का असर दण्ड या पुरस्कार के रूप में हमारे इस जन्म तथा आने वाले जन्मों, हमारे परिजनों एवं वंशजों पर भी पड़ता है।
आपने सुना भी होगा कि हमारे पूर्वजों के अच्छे कर्म हमें मुश्किलों से बचाते है, बड़े बुजर्ग कहते है कि हमारे पूर्वजों के पुण्यफल और सत्कर्मों से हम पर तथा हमारे परिवार पर आयी मुसीबत टल गयी।

सदैव याद रखें इस संसार का सबसे बड़ा और अटल सत्य मृत्यु है। दुनिया में हर व्यक्ति चाहे वो बड़ा हो या छोटा, अमीर हो या गरीब अपना वापसी का टिकट लेकर ही इस संसार में आया है उस टिकट पर वापसी का समय तथा दिनांक भी लिखा है परन्तु हमें इसका ज्ञान नही होता है और वह समय कभी का भी हो सकता है। मृत्यु आकस्मिक भी हो सकती है और वृद्धावस्था में भी, स्वाभाविक सुखद भी हो सकती है और लम्बी बिमारी में भी। मृत्यु होने पर चाहे कोई कितना भी अमीर क्यों ना हो, अपने साथ कुछ भी नही ले जा सकता है, वापसी बिल्कुल खाली हाथ ही होनी है, इस पथ्वी की हर वस्तु यही पर रह जानी है, केवल आपके जीवन के संचित पुण्य तथा पाप ही है जो आपकी जीवन भर की कमाई है, वही आपके साथ जायेंगे, इन्ही के आधार पर ईश्वर आपकी आगे की गति एवं योनि का निर्धारण करेंगे।

प्रत्येक धर्म मानता है कि मनुष्य का अपना भाग्य होता है, इस भाग्य का निर्धारण उसके पूर्व के कर्मों के आधार पर ही होता है परन्तु इस भाग्य में कुछ हद तक इस जन्म के कर्मों से भी परिवर्तन होता है। अपने कर्मानुसार हम भाग्य द्वारा प्राप्त होने वाले फल (सजा, पुरस्कार) को कम ज्यादा कर सकते है। वस्तुतः ईश्वर हमें हर योनि अपने पिछले जन्म के कर्ज चुकाने तथा अगले जन्म को सुखद बनाने के लिये ही देते है।

प्रत्येक धर्म में सत्कर्मों की अलग-अलग व्याख्या दी है परन्तु सभी धर्मों का मूल लक्ष्य एक ही है। वस्तुतः सभी धर्मों में सत्य, अंहिसा, दया, दान, प्रेम, संयम, शान्ति, ईमानदारी, ईश्वर में आस्था, माता-पिता, गुरूजनों, बड़े बुजुर्गों एवं पूर्वजों के प्रति आदर श्रद्धा एवं कृतज्ञता पर जोर दिया गया है। सदैव घृणा, ईर्ष्या, लालच, बेईमानी से दूर रहना चाहिये। जीवन में भूल कर भी दूसरों के घर की स्त्री, परायी स्त्री पर बुरी नजर नहीं डालनी चाहिये तथा असहायों गरीबों पर अत्याचार करने से बचना चाहिये। अपने तथा अपने परिवार के जीविकोपार्जन करने के लिये सदैव परिश्रम कौशल एवं इमानदारी से धन कमाना चाहिये। याद रखिये अपना पेट तो पशु भी भर लेते है लेकिन अगर हम मनुष्य है तो हमें निर्धनों, असहायों, अनाथों एवं रोगियों की भी यथासम्भव मदद करनी चाहिये, यही सबसे बड़ा धर्म, पुण्य एवं आत्मिक सन्तोष प्रदान करने वाला कार्य है। हमें सदैव अपना अन्तःकरण निर्मल एवं स्वच्छ रखना चाहिये। प्रत्येक मनुष्य के सत्कर्मों से ही उसका उसके वंश का तथा समाज का उचित विकास सम्भव है।

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