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सूर्यग्रहण के उपाय
Surya Grahan ke upay


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सूर्य ग्रहण में क्या करें ना करें
Surya Grahan Me kya kare kya Na Karen

ग्रहण के समय पवित्र नदियों, सरोवरों में स्नान करना से बहुत पुण्य मिलता है लेकिन ग्रहण के स्नान में कोई मंत्र नहीं बोलना चाहिए।

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शास्त्रों के अनुसार ग्रहण ( grahan ) के समय गायों को हरा चारा या घास, चींटियों को पंजीरी या चीनी मिला हुआ आटा, पक्षियों को अनाज एवं निर्धन, असहायों को वस्त्रदान से बहुत ज्यादा पुण्य प्राप्त होता है।

सूर्य फूल, ग्रहण ( grahan ) वाले दिन पत्ते, लकड़ी अथवा तिनके, आदि नहीं तोड़ने चाहिए। इस दिन बाल तथा वस्त्र नहीं धोने, निचोड़ने चाहिए । ग्रहण ( grahan ) के समय सोना, मल-मूत्र का त्याग, मैथुन, खाना पीना , उबटन लगाना, ताला खोलना किसी वस्तु का क्रय करना आदि कार्य वर्जित हैं।

शास्त्रो के अनुसार ग्रहण के समय सोने से रोगी, लघुशंका करने से दरिद्र, मल त्यागने से कीड़ा, स्त्री प्रसंग करने से सूअर और उबटन लगाने से व्यक्ति कोढ़ी होता है।

देवी भागवत के अनुसार भूकंप एवं ग्रहण के अवसर पर पृथ्वी को बिलकुल भी नहीं खोदना नहीं चाहिए, ऐसा करने या कराने वाला घोर नरक का भागी बनता है ।

सूर्य ग्रहण ( surya grahan ) के समय कोई भी शुभ व नवीन कार्य शुरू नहीं करना चाहिए , उसमें असफलता ही हाथ लगती है ।

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सूर्य ग्रहण ( surya grahan ) के दौरान व्यक्तियों को यथा संभव घर से बाहर नहीं निकलना चाहिए और न ही ग्रहण के दर्शन करने चाहिए। गर्भवती महिला को ग्रहण के समय विशेष सावधान रहना चाहिए। गर्भवती महिलाओं को ग्रहण का दर्शन बिलकुल ही त्याज्य है।

शास्त्रो के अनुसार गर्भवती स्त्री को ग्रहण ( grahan ) नहीं देखना चाहिए, क्योंकि उसके दुष्घ्प्रभाव से शिशु विकलांग बन सकता है , गर्भपात की संभावना बढ़ती है । इसके लिए गर्भवती के उदर भाग में गोबर और तुलसी का लेप लगा दिया जाता है, जिससे कि राहू केतू उसका स्पर्श न करें ।

सूर्य ग्रहण ( surya grahan ) के दौरान गर्भवती स्त्री को कुछ भी कैंची, चाकू आदि से काटने, वस्त्र आदि को सिलने से मना किया जाता है । क्योंकि माना जाता है कि ऐसा करने से शिशु के अंग कट जाते हैं उसे रोग हो सकते है ।

संतानयुक्त गृहस्थ को ग्रहण और संक्रान्ति के दिन उपवास नहीं करना चाहिए।

सूर्यग्रहण ( surya grahan ) के सूतक और ग्रहण काल में स्नान, दान, जप, तप, पूजा पाठ, मन्त्र, तीर्थ स्नान, ध्यान, हवनादि शुभ कार्यो का करना बहुत लाभकारी रहता है। ज्ञानी लोग इस समय का अवश्य ही लाभ उठाते है । धर्म सिन्धु के अनुसार, ग्रहण मोक्ष के उपरान्त पूजा पाठ, हवन, स्नान, छाया-दान, स्वर्ण-दान, तुला-दान, गाय-दान, मन्त्र जाप आदि श्रेयस्कर होते हैं। ग्रहण के समय संयम रखकर जप-ध्यान करने से कई गुना फल होता है। ग्रहण काल के समय अर्जित किया गया पुण्य अक्षय होता है ।

वेदव्यास जी ने कहा है कि - सामान्य दिन से चन्द्रग्रहण में किया गया जप , तप, ध्यान, दान आदि एक लाख गुना और सूर्य ग्रहण में दस लाख गुना फलदायी होता है। और यदि यह गंगा नदी के किनारे किया जाय तो चन्द्रग्रहण में एक करोड़ गुना और सूर्यग्रहण में दस करोड़ गुना फलदायी होता है।

ग्रहण ( grahan ) के समय अपने गुरुमंत्र, इष्टमंत्र अथवा किसी भी सिद्ध मन्त्र का जाप अवश्य ही करें ऐसा ना करने से मंत्र को मलिनता प्राप्त होती है।

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सूर्य ग्रहण ( surya grahan ) के दिन जलाशयों, नदियों व मन्दिरों में राहू, केतु व सुर्य के मंत्र का जप करने से सिद्धि प्राप्त होती है और ग्रहों का दुष्प्रभाव भी खत्म हो जाता है ।

ग्रहण ( grahan ) के समय किसी भी दशा में क्रोध, हिंसा या किसी के साथ ठगी नहीं करनी चाहिए।

ग्रहण ( grahan ) के समय क्रोध करने, हिंसा करने या किसी भी जीव-जन्तु की हत्या करने से चिर काल तक नारकीय योनी में भटकना पड़ता है , किसी से धोखा देकर उसका धन हड़पने से सर्प की योनि मिलती है उसकी आने वाली पीढ़ियों को भी आर्थिक संकटों से जूझना पड़ता है।

ग्रहण वाले दिन किसी भी व्यक्ति को किसी भी दशा में माँस और मदिरा का सेवन नहीं करना चाहिए, बहुत से लोग ग्रहण से पहले या बाद में उक्त का सेवन करते है और यह तर्क देते है कि उन्होंने ग्रहण के समय नहीं लिया है लेकिन यह बिलकुल गलत है । ग्रहण वाले दिन माँस मदिरा का सेवन करने वाला घोर नरक का पापी होता है इसका पाप उसके परिजनों को भी भोगना पड़ता है । ऐसे व्यक्ति के परिवार में असाध्य रोग अपना घर बना लेते है।

सूर्यग्रहण ( surya grahan ) में बाल और दाढ़ी ना कटवाएं और बालो में डाई या मेहंदी भी नहीं लगानी चाहिए ।

सर्यग्रहण ( surya grahan ) में किसी से भी उधार ना लें और ना ही किसी को उधार धन दें । उधार लेने से दरिद्रता आती है और उधार देने से लक्ष्मी रुष्ट हो जाती है ।

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ग्रहण की अवधि में गर्भवती का ‘संतान गोपाल मंत्र’ का जाप करना अति उत्तम माना जाता है। शास्त्रों के अनुसार इस मंत्र के जाप से गर्भवती को गुणवान पुत्र रत्न की प्राप्ति होती है।

* देवकीसुत गोविंद, वासुदेव जगत्पते,
* देहि में तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं भजे।
* देव देव जगन्नाथ गोत्रवृद्धिकरं प्रभो,
* देहि में तनयं शीघ्रं, आयुष्मन्तं यशस्विनम्।।
* इसका अर्थ है, जगत्पति हे भगवान कृष्ण! मैं आपकी ही शरण में हूं। हे जगन्नाथ, मुझे मेरे गोत्र की वृद्धि करने वाला और यशस्वी पुत्र प्रदान कीजिए।

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सूर्य ग्रहण के समय सूर्य देव का मन्त्र "ॐ ह्रीं घृणिः सूर्य आदित्यः क्लीं ॐ "॥ और "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" मन्त्र का जाप अवश्य ही करना चाहिए ।



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पं मुक्ति नारायण पाण्डेय
( कुंडली, ज्योतिष विशेषज्ञ )


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