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पितरों का श्राद्ध कर्म

Pitron Ka Shardh

पसीने की बदबू के उपाय

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पितरों का श्राद्ध कर्म

Pitron Ka Shradh Karm

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श्राद्ध का महत्व
Shradh ka mahatv

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हिन्दू धर्म शास्त्र में कहा गया भी गया है कि जो मनुष्य श्राद्ध करता है वह पित्तरों के आशीर्वाद से आयु, पुत्र, यश, बल, वैभव, सुख तथा धन-धान्य प्राप्त करता है। इसीलिये हिन्दू लोग अश्विन माह के कृष्ण पक्ष में प्रतिदिन नियमपूर्वक स्नान करके पित्तरों pitron का तर्पण करते है तथा जो दिन उनके पिता की मृत्यु का होता है उस दिन अपनी शक्ति के अनुसार दान एवं ब्राहमणों को भोजन कराते है।

Kalash One Image पहले समय में इस देश में श्राद्ध कर्म का बहुत प्रचार था लोग अपने कर्त्तव्य पालन के लिये सुध-बुध भूल जाते थे, लोग सम्पूर्ण पितृ पक्ष में दाढ़ी, बाल नहीं बनाते थे, तेल नहीं लगाते थे, किसी प्रकार का नशा नहीं करते थे तथा पित्तरों pitron को पुण्य प्रदान करने के लिये सत्कर्म, दान, पुण्य, पूजा-अर्चना में लगे रहते थे।

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Kalash One Image पित्तरों pitron का पिण्डदान करने का सबसे बड़ा स्थान गया माना गया है। यह मान्यता है कि गया में पिण्डदान करने से फिर प्रतिवर्ष पिण्डदान की आवश्यकता नहीं रहती है।

Kalash One Image इसे "तीर्थों का प्राण" तथा "पाँचवा धाम" भी कहते है। माता के श्राद्ध के लिए काठियावाड़ में 'सिद्धपुर' को अत्यन्त फलदायक माना गया है। इस स्थान को 'मातृगया' के नाम से भी जाना जाता है। गया में पिता का श्राद्ध करने से पितृऋण से तथा सिद्धपुर में माता का श्राद्ध करने से मातृऋण से सदा-सर्वदा के लिए मुक्ति प्राप्त होती है।
Kalash One Image इसके अतिरिक्त गंगासागर तथा
Kalash One Image महाराष्ट्र में त्र्यम्बकेश्वर,
Kalash One Image हरियाणा में पिहोवा,
Kalash One Image उत्तर प्रदेश में गडगंगा,
Kalash One Image उत्तराखंड में हरिद्वार भी पितृ दोष के निवारण के लिए श्राद्धकर्म को करने हेतु उपयुक्त स्थल हैं। इन स्थलों में जाकर वे श्रद्धालु भी पितृ पक्ष के श्राद्ध आरंभ कर सकते हैं, जिन्होंने पहले कभी भी श्राद्घ न किया हो।

Kalash One Image श्राद्ध श्रद्धा शब्द से बना है। श्रद्धापूर्वक किये गये कर्म को श्राद्ध कहते है। पित्तरों का श्राद्ध करने से कुछ लाभ है अथवा नहीं इसका उत्तर है कि लाभ है अवश्य है और यह लाभ श्राद्ध करने वाले को अत्यधिक तथा पित्तरों को उसका सूक्ष्म अंश मिलता है जिससे वह अत्यधिक शक्ति, प्रसन्नता एवं सन्तोष का अनुभव करते हैं । क्योंकि इस संसार में प्रत्येक जीव या आत्मा किसी ना किसी रूप में विद्यमान अवश्य रहती है। श्राद्ध के समय पित्तरों के द्वारा जो हमारे ऊपर उपकार हुये है उनका स्मरण करके उनके प्रति अपनी श्रद्धा एवं भावना जरूर व्यक्त करनी चाहिये।

Kalash One Image यह मान्यता है कि पित्तर पक्ष में जिस दिन हमारे पित्तरों का श्राद्ध होता है वह स्वयं भी वहाँ सूक्ष्म रूप में उपस्थित रहते हैं तथा ब्राहमणों के साथ वायु रूप में भोजन करते है।

Kalash One Image महाभारत में एक प्रसंग है कि जब भीष्म जी अपने पिता महाराज शान्तनु का पिण्डदान करने लगे तो उनके सम्मुख साक्षात शान्तनु जी के दाहिने हाथ ने प्रकट होकर पिण्ड ग्रहण किया।

Kalash One Image कहते है कि भगवान श्रीराम ने भी गया आकर फाल्गू नदी के किनारे अपने पिता राजा दशरथ का पिण्डदान किया था।

Kalash One Image रामायण के अनुसार जब मर्यादा पुरूषोत्तम भगवान श्रीराम वन में अपने पिता का श्राद्ध कर रहे थे तब सीता जी ने श्राद्ध की समस्त सामग्रियां स्वयं अपने हाथ से तैयार की लेकिन जब ब्राहमणों को भोजन करने के लिये आमंत्रित किया गया तो वह कुटी में जल्दी से जा छुपी।
बाद में जब भगवान राम ने सीता जी से उनकी परेशानी एवं छुपने का कारण पूछा तो उन्होंने कहा मैंने उन ब्राहमणों में आपके पिता महाराज दशरथ जी के दर्शन किये है, उनके सम्मुख मैं सदैव आभूषणों से सुशोभित रही हूँ वह कैसे मुझे इन कपड़ों में बिना आभूषणों, पसीने मैल से सना हुआ देख पाते।

Kalash One Image इसलिये श्राद्ध की तिथि में इस बात का भान रहे कि आपके पित्तर किसी ना किसी रूप में स्वयं उपस्थित हैं तथा आपका उनके निमित्त श्रद्धा से किये गये कर्म से वह अवश्य ही संतुष्ट होंगे तथा आपको आशीर्वाद देंगे लेकिन अगर हमने उनके प्रति आभार कृत्तज्ञता एवं श्राद्ध कर्म नहीं किया तो वह फिर पूरे वर्ष निराशा, बेचैनी, निर्बलता एवं दुख का अनुभव करेंगे। शास्त्रों में भी श्राद्ध कर्म को हर हिन्दू का पुनीत एवं अनिवार्य कर्त्तव्य बताया गया है।

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Published By : Memory Museum
Updated On : 2018-09-15 17:10:00 PM
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पितरों का श्राद्ध, पितरों का तर्पण

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पसीने की बदबू के उपाय

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