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सांई बाबा | sai baba


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शिरडी के सांई बाबा द्वारा शरीर त्यागे लगभग 90 वर्ष बीत गये है परन्तु उनकी ख्याति दिनों दिन बढ़ती ही जा रही है आज ना केवल भारत में वरन पूरे विश्व में उनके करोड़ों अनुयायी हो गये है कहते है सांई सदैव अपने भक्तों का मार्गदर्शन करने उनकी चिन्ताओं, परेशानियों को दूर करने के लिये उनके साथ सूक्ष्म रूप में विद्यमान रहते है कहा जाता है कि सन् 1854 को सत्यश्री सांई नाथ 15 साल की उम्र में पहली बार शिरडी आये थे, उनका दिव्य रूप अनायस ही लोगों का अपनी ओर आकर्शित कर लेता था, उनका आचरण सन्त महात्माओं की तरह था। कुछ दिन शिरडी में रहने के बाद सांई नाथ वापस चले गये। साई नाथ के जन्म, उनके परिवार, उनके बचपन के बारे में कोई भी पर्याप्त जानकारी नही है वह पूरे विश्व को ही अपना घर अपना परिवार समझते थे।

जब सांई नाथ दोबारा शिरडी आये तो उस बार उन्होंने एक पुरानी वीरान मस्जिद में अपना निवास बनाया, यहाँ पर बाबा लगभग 60 वर्ष तक रहे, इस मस्जिद को बाबा ने द्वारिका माई नाम दिया जहाँ हर धर्म, हर वर्ग के लोगों को आश्रय मिलता था। धीरे-धीरे लोग बाबा की अदभुत शक्तियों को पहचानने लगे, लोग अपने दुख अपनी परेशानियाँ लेकर बाबा के पास आते और उनके आर्शीवाद से अपने कष्टों से छुटकारा पाते, बाबा के चमत्कार चारों दिशाओं में फैलने लगे चाहे कोई छोटा हो या बड़ा, अमीर हो या गरीब, साधू महात्मा, बड़े बड़े विद्वान, अधिकारी, राजनेता आदि सब इनकी शरण में आने लगे, बाबा ने हमेशा सबका ख्याल रखा सबके कष्टों को दूर किया। इनकी इसी ख्याति के कारण कुछ लोग उनसे जलने लगे उन्होंने बाबा के खिलाफ षड़यन्त्र भी रचे लेकिन अन्त में वह सभी बाबा के चरणों के दास हो गये।

15 अक्टूबर 1918 को विजयदषमी के दिन बाबा ने महासमाधि ले ली, इसका पूर्वानुमान बाबा को पहले से ही हो गया था कहते है बाबा के पास एक ईंट थी जिसे वह हमेशा अपने साथ रखते थे, सांई दिन में इस पर हाथ टेकते थे तथा रात को यही ईंट इनका तकिया बन जाती थी, एक दिन 1918 ई0 के सितम्बर माह में एक भक्त से सफाई के समय यह ईंट टूट गयी बाबा उस समय बाहर भिक्षा लेने गये थे, लौटकर आने पर वह टूटी ईंट देखकर सांई बाबा ने अपने शरीर त्यागने की घोषणा कर दी और 15 अक्टूबर सन् 1918 के विजयदशमी के दिन सांई बाबा ने दोपहर लगभग 2:30 बजे महासमाधि ले ली। महासमाधि से पूर्व सांई बाबा ने अपने भक्तों को यह आशीर्वाद दिया कि उनके बाद उनकी समाधि भक्तों का कल्याण करेंगी वह सदैव अपने भक्तों के दिलों में निवास करेंगे।

नागपुर के एक प्रसिद्ध सेठ बाबू साहिब बूटी सांई बाबा के परम भक्त थे वह बाबा के कहने से शिरडी में मन्दिर सहित बाड़ा बना रहे थे जिसमें भगवान श्रीकृष्ण की मूर्ति स्थापित होनी थी अपनी महासमाधि से पूर्व बाबा ने अपनी सेविका लक्ष्मीबाई षिंइ को 9 सिक्के आषीर्वाद के रूप में देते हुये कहां मुझे मस्जिद में अब अच्छा नही लगता है इसलिये मुझे बूटी के पत्थर बाड़े में ले चलों मैं वहीं पर सुखपूर्वक रहूँगा और फिर वही बाड़ा उनकी समाधि स्थल बन गया।

बाबा के उपदेशों में संसार के सभी धर्मों का सार है बाबा कहते थे सबका मालिक एक है, उन्होंने सभी धर्मों के लोगों को मिलजुल कर एक साथ प्रेम से रहने को कहा। उन्होंने अपने सभी भक्तों को श्रद्धा और सबूरी (संयम) का पाठ पढ़ाया जो आज उनके करोड़ों भक्तों का गुरू यन्त्र है।

शिरडी में बाबा की समाधि को दिव्य स्थान के रूप में मान्यता है और शिरडी स्थान को तीर्थ स्थान का दर्जा प्राप्त है आज विश्व के कोने-कोने से सभी धर्मों के लोग सांई बाबा के दर्शनों के लिये एक बार नहीं बार-बार यहाँ पर आते है और उनके दिव्य स्वरूप से अभिभूत होकर चारों तरफ उनकी शिक्षाओं को फैलाते है, इसी कारण भारत के कोने-कोने में सांई भक्तों ने बाबा के मंदिर बना रखे है।


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