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रिषभदेव मन्दिर
Rishabhdev Mandir


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रिषभदेव जैन मन्दिर
Rishabhdev Jain Mandir






रिषभदेव प्रथम जैन तीर्थकर थे यह मन्दिर उन्ही के नाम पर स्थापित किया गया है। जैन धर्म में इस मन्दिर का बहुत महत्वपूर्ण स्थान है। वैष्णव ऐसा मानते है कि वह विष्णु के आठवें अवतार थे। यह मन्दिर उदयपुर से 40 किमी दूर स्थित है। यह मन्दिर जैन श्वेताम्बरों से सम्बन्धित है यह मन्दिर राजस्थान की राज्य सरकार के नियन्त्रण में है। इस मन्दिर में भगवान रिषभदेव (भगवान आदिनाथ) की अत्यन्त सुन्दर मूर्ति स्थापित है इन्हे यहाँ पर केसरिया जी के नाम से भी जाना जाता है क्योंकि स्थानीय लोग अपनी परम्परा के अनुसार यहाँ इनकी पूजा केसर से करते हैं। भगवान रिषभदेव की मूर्ति काले पत्थर की बनी है जिसे एक ही पत्थर को काट कर बनाया गया है। यह मूर्ति 3.5 फिट ऊँची है जो पद्मासन की मुद्रा में है तथा इसमें भगवान के लम्बे बाल इनके कन्धों तक दर्शाये गये है। यहाँ पर भगवान रिषभदेव की मूर्ति काले रंग की होने के कारण स्थानीय लोग तथा आदिवासियों में यह “कालिया बाबा” के नाम से भी प्रसिद्ध हैं। एक बार ढूला नाम के भील जनजाति के व्यक्ति ने इस प्रतिमा की रक्षा की थी, अतः रिषभदेव के शहर को ढूलव नाम से भी पुकारा जाता है। भील जनजाति के लोग रिषभदेव जी के लिए अत्यंत ही श्रद्धा एवं निष्ठा का भाव रखते हैं।

यह मन्दिर कोयल नदी के किनारे स्थित है और उस क्षेत्र के लोगों के लिए विशेष महत्व रखता है। रिषभदेव मन्दिर में स्थापित प्रतिमा अत्यन्त प्राचीन है और ऐसा मानते है। कि यहाँ भक्तों की सारी मन्नते पूरी हो जाती है। रिषभदेव के मन्दिर में स्थापित प्रतिमा के उद्भव के विषय में अब तक कोई भी सही जानकारी प्राप्त नही हुयी है परन्तु ऐसा माना जाता है कि यह अत्यंत प्राचीन है। स्थानीय जनता का मानना है कि यह प्रतिमा रावण के काल से हैै। ऐसा भी कहा जाता है कि रावण इस प्रतिमा को अपने साथ नन्दावन से लंका ले गया था और रामचन्द्र जी ने लंकाविजय के पश्चात इसे पुनः अपने स्थान पर स्थापित कर दिया था।

रिषभदेव कीे मन्दिर की वजह से शहर को विशिष्ट स्थान प्राप्त है। रिषभदेव से 2 किमी दूरी पर एक स्थान है जो पग्लिया जी के नाम से प्रसिद्ध है यहाँ पर भगवान रिषभदेव के पगचिन्ह उपस्थित हैं जिनकी श्रद्धालुगण अत्यंत श्रद्धा से पूजा करते हैं। भगवान रिषभदेव के जन्मदिन में चैत्रमास में यहाँ पर एक बड़े मेले का आयोजन किया जाता है जिसमें दूर-दूर से आकर बड़ी संख्या में श्रद्धालु गण एकत्र होते हैं।


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