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पित्तरों का महत्व

Pitron Ka Mahtwa

पसीने की बदबू के उपाय

क्या आपको अपने पूर्वजों के प्रति अपने कर्तव्यो का ज्ञान हैं और उनके प्रति आदर, श्रद्धा एवं कृतज्ञता का भाव वयक्त करना चाहते हैं, उनका आशीर्वाद प्राप्त करना चाहते है ? अब, विश्व में पहली बार एक साइट के माध्यम से उनके नाम और यादों को हमेशा के लिये अमर बनाइये। अपने जीवन में निश्चित बदलाव का अनुभव कीजिए


पित्तरों का महत्व

Pitron ka Mahtva

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पित्तरों का महत्व
Pitron Ka Mahtwa


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hand logo संसार के समस्त धर्मों में कहा गया है कि मरने के बाद भी जीवात्मा का अस्तित्व समाप्त नहीं होता है वरन वह किसी ना किसी रूप में बना ही रहता हे। जैसे मनुष्य कपड़ों को समय समय पर बदलते रहते है उसी तरह जीव को भी शरीर बदलने पड़ते है जिस प्रकार तमाम जीवन भर एक ही कपड़ा नहीं पहना जा सकता है उसी प्रकार आत्मा अनन्त समय तक एक ही शरीर में नही ठहर सकती है।

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ना जायते म्रियते वा कदाचिन्नाय भूत्वा भविता वा न भूपः

ऊजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे


गीता.2ए अध्याय.20

अर्थात आत्मा ना तो कभी जन्म लेती है और ना ही मरती है मरना जीना तो शरीर का धर्म है शरीर का नाश हो जाने पर भी आत्मा का नाश नहीं होता है। विज्ञान के अनुसार कोई भी पदार्थ कभी भी नष्ट नहीं होता है वरन् उसके रूप में परिवर्तन हो जाता है।

hand logo पितृ हमारे ही कुल के पूर्वजो की आत्माए है जो ईश्वर को प्यारे हो चुके है। यह पितृ लोक में वास करती है पर इनकी आसक्ति हमारे घर के सभी सदस्यों पर होती है।
गरूड़ पुराण के अनुसार मृत्यु के पश्चात आत्मा प्रेत रूप में यमलोक की यात्रा शुरू करती है। सफर के दौरान संतान द्वारा प्रदान किये गये पिण्डों से प्रेत आत्मा को बल मिलता है। यमलोक में पहुंचने पर उस आत्मा को अपने कर्मानुसार प्रेत योनी में ही रहना पड़ता है अथवा अन्य योनी प्राप्त होती है।

hand logo हिन्दू धर्म में पितरों को देवताओं के समान पूजनीय बताया गया है। शास्त्रों के अनुसार चन्द्रमा के ऊपर एक अन्य लोक है जो पितर लोक कहलाता है। जैसे मनुष्य मनुष्य लोक में रहता है वैसे ही पुण्य आत्माए पितृ लोक में रहती है। पितृ लोक के ऊपर सूर्य लोक है एवं इनसे उपर स्वर्ग लोक है।

hand logo गीता में भगवान श्री कृष्ण ने कहा है कि वह पितरों में अर्यमा नामक पितृ हैं। अर्थात पितरों की पूजा करने से भगवान श्री कृष्ण / भगवान विष्णु की ही पूजा होती है।

hand logo विष्णु पुराण के अनुसार सृष्टि की रचना के समय ब्रह्मा जी के पीठ से पितर उत्पन्न हुए। पितरों के उत्पन्न होने के बाद ब्रह्मा जी ने अपने उस शरीर को त्याग दिया था । पितर को जन्म देने वाला ब्रह्मा जी का शरीर संध्या बन गया, इसलिए पितर संध्या के समय शक्तिशाली होते हैं।


hand logo हर व्यक्ति के तीन पूर्वज पिता, दादा और परदादा क्रम से वसु, रुद्र और आदित्य पितृ के समान माने जाते हैं। शास्त्रों के अनुसार श्राद्ध के वक़्त वे ही अन्य सभी पूर्वजों के प्रतिनिधि होते हैं।

hand logo क्या आप जानते है कि पितृ पक्ष अश्विन माह में ही क्यों आते है दरअसल हमारा एक माह चंद्रमा का एक अहोरात्र होता है। इसीलिए ऊर्ध्व भाग पर रह रहे पितरों के लिए कृष्ण पक्ष उत्तम होता है। ज्योतिषशास्त्र के अनुसार पृथ्वी लोक में देवता उत्तर गोल में विचरण करते हैं और दक्षिण गोल भाद्रपद मास की पूर्णिमा को चंद्रलोक के साथ-साथ पृथ्वी के नज़दीक से गुजरता है।

hand logo पितृ पक्ष की प्रतीक्षा हमारे पूर्वज पूरे वर्ष करते हैं। वे चंद्रलोक के माध्यम से दक्षिण दिशा में पितृ पक्ष में अपने घर के दरवाज़े पर पहुँच जाते है और अपने वंशजो से अपने निमित तर्पण, श्राद्ध, दान-पुण्य, अपना सम्मान पाकर प्रसन्नतापूर्वक अपनी नई पीढ़ी को अपना शुभ आर्शीवाद देकर चले जाते हैं।
शास्त्रों में पितरो को देवताओं से भी अधिक दयालु और कृपालु कहा गया है। शास्त्रों के अनुसार हमारे पितृ पितृपक्ष में तर्पण और श्राद्ध द्वारा वर्ष भर तृप्त रहते हैं। मान्यता है कि जिस घर में पूर्वजों का श्राद्ध होता है वह घर पितरों द्वारा सदैव हर आपदाओं से सुरक्षित रहता है।

hand logo व्यक्ति के सत्संस्कार होने के बाद यही अक्षय आत्मा पित्तर रूप में क्रियाशील रहती है तथा अपनी आत्मोन्नति के लिये प्रयासरत रहने के साथ पृथ्वी पर अपने स्वजनों एवं सुपात्रों की मदद के लिये सदैव तैयार रहती है।

hand logo पित्तरों के प्रति श्रृद्धा उनका स्मरण एवं उचित संस्कार करने से हमें सदैव पित्तरों से लाभ ही मिलता है। पित्तर वह उच्च आत्माएं होती है जो अपने स्वभाव एवं संस्कार के कारण दूसरों की यथासम्भव सहायता करती है।
हिन्दु धर्म ग्रंथो में पितरों को संदेशवाहक भी कहा गया है|

शास्त्रों में लिखा है..............

ॐ अर्यमा न तृप्यताम इदं तिलोदकं तस्मै स्वधा नम:।ॐ मृर्त्योमा अमृतं गमय||

अर्थात, अर्यमा पितरों के देव हैं, जो सबसे श्रेष्ठ है उन अर्यमा देव को प्रणाम करता हूँ ।

hand logo हे! पिता, पितामह, और प्रपितामह। हे! माता, मातामह और प्रमातामह आपको भी बारम्बार प्रणाम है । आप हमें मृत्यु से अमृत की ओर ले चलें। इसका अर्थ है कि हम पूरे वर्ष भर अपने देवों को समर्पित अनेकों पर्वों का आयोजन करते हैं, लेकिन हममे से बहुत लोग यह महसूस करते है की हमारी प्रार्थना देवों तक नही पहुँच प़ा रही है।

hand logo हमारे पूर्वज देवों और हमारे मध्य एक सेतु का कार्य करते हैं,और जब हमारे पितृ हमारी श्रद्धा, हमारे भाव, हमारे कर्मों से तृप्त हो जाते है हमसे संतुष्ट हो जाते है तो उनके माध्यम से उनके आशीर्वाद से देवों तक हमारी प्रार्थना बहुत ही आसानी से पहुँच जाती है और हमें मनवांछित फलों की शीघ्रता से प्राप्ति होती है ।

hand logo पित्तरों का सूक्ष्म जगत से सम्बन्ध होने के कारण यह अपने परिजनों स्वजनों को सतर्क करती रहती है तथा तमाम कठनाइयों को दूर कराकर उन्हें सफलता भी दिलाती है। समान्यतः यह सर्वसाधारण को अपनी उपस्थिति का आभास भी नहीं देते है परन्तु उपर्युक्त मनोवृर्ति एवं व्यक्तित्व को देखकर यह उपस्थित होकर भी सहयोग एवं परामर्श देते है।

hand logo पित्तरों का उद्देश्य ही अपने वंशजों को पितृवत स्नेह दुलार सहयोग एवं खुशियां प्रदान करना है संसार में तमाम उदाहरण उपलब्ध है जब इन्होंने दैवीय वरदान के रूप में मदद की है।

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Published By : Memory Museum
Updated On : 2018-09-15 17:10:00 PM

पित्तरों का महत्व

Pitron Ka Matva

पसीने की बदबू के उपाय

दोस्तों क्या आप जानते है की एक साईट ऐसी है जहाँ पर हर पल आप और आपके परिवार को शुभकामनायें और आशीर्वाद प्राप्त होता है, इस अनोखी साईट के माध्यम से अपने अपने धर्मों के तीर्थों, सिद्ध दुर्लभ यंत्रों और अपने पित्तरों का दिव्य आशीर्वाद लें अपने जीवन में सुख, शांति, सम्रद्धि , मनवांछित सफलता और असीम आत्मबल प्राप्त करें |


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Pitron ka Mahatva

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