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माँ लक्ष्मी

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Diwali Diye माँ लक्ष्मी Diwali Diye
Diwali Diye Ma Lakshmi Diwali Diye


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Diwali Diye माँ लक्ष्मी की उत्पत्ति Diwali Diye
Diwali Diye Ma Lakshmi ki Utpatti Diwali Diye


हिन्दू धर्म में लक्ष्मी जी को प्रमुख देवी माना गया हैं।लक्ष्मी जी भगवान श्री विष्णु की पत्नी हैं और धन, सुख- समृद्धि और ऐश्वर्य की देवी मानी जाती हैं। दीपावली के त्योहार में उनकी गणेश सहित पूजा की जाती है। माँ लक्ष्मी जिस पर कृपालु होती है वह कभी भी दरिद्र नहीं रहता है उसे समस्त सांसारिक सुख और ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है
जानिए माँ लक्ष्मी, Ma Lakshmi,माँ लक्ष्मी की उत्पत्ति, Ma Lakshmi ki Utpatti ।

Om Sign प्राचीन धर्म ग्रंथों में लक्ष्मी की उत्पत्ति के विषय में अनेक कथाएं लिखी गयी है हैं। भारतीय संस्कृति के प्राचीनतम वेद ऋग्वेद में लक्ष्मी की उत्पत्ति का आभास श्रीसूक्त द्वारा लिखा है। जहां उन्हें ‘पद्मसम्भवा’ कहा गया है।



Diwali Diye माँ लक्ष्मी की उत्पति की कथा Diwali Diye


Om Sign लक्ष्मी की उत्पत्ति Lakshmi ki Utpatti संबंधी प्रचलित कथाओं में समुद्र मंथन की कथा का महत्वपूर्ण स्थान है। यह कथा अनेक ग्रंथों में उपलब्ध है। लक्ष्मी के जन्म से संबंधित समुद्र मंथन की कथा विष्णु महापुराण में विस्तारपूर्वक लिखी गयी है। विष्णु पुराण के अनुसार यह कथा इस प्रकार है

Om Sign शास्त्रों एवं पुराणों के अनुसार एक बार भूल से देवराज इंद्र ने महामुनि ‘दुर्वासा’ द्वारा दी गई पुष्पमाला का अपमान कर दिया। इस पर मुनि के श्राप से इंद्र को भी ‘श्री’ हीन होना पड़ा जिसके कारण सभी देवगण और मृत्युलोक भी ‘श्री’ हीन हो गए।

Om Sign कथा के अनुसार एक बार महर्षि दुर्वासा घूमते-घूमते एक मनोहर वन में गये। वहाँ एक विद्याधरी सुन्दरी ने उन्हें दिव्य पुष्पों की एक माला भेंट की। माला को अपने मस्तक पर डाल कर मुनि पुन: पृथ्वी पर भ्रमण करने लगे। इसी समय दुर्वासा जी को देवराज इन्द्र ऐरावत पर चढ़कर आते दिखे। उनके साथ अन्य देवता भी थे।

Om Sign महर्षि दुर्वासा ने वह माला इन्द्र को दे दी। देवराज इन्द्र ने उस माला को ऐरावत के मस्तक पर डाल दिया। ऐरावत हाथी ने माला की तीव्र गन्ध के कारण उसे सूँड़ से उतार कर अपने पैरों तले रौंद डाला। माला की या दुर्दशा देखकर महर्षि दुर्वासा क्रोधित हो गए और उन्होंने इन्द्र को श्री भ्रष्ट होने का शाप दे दिया। उसी शाप के प्रभाव से इन्द्र श्री भ्रष्ट हो गये और सम्पूर्ण देवलोक पर असुरों का शासन हो गया, इसी कारण लक्ष्मी दुखी मन से स्वर्ग को त्याग कर बैकुंठ आ गई और महालक्ष्मी में लीन हो गई।

Om Sign समस्त देवता असुरों से संत्रस्त होकर इधर-उधर भटकने लगे। ब्रह्मा जी की सलाह से सभी देवता भगवान विष्णु की शरण में गये। तब भगवान श्री विष्णु ने देवताओं को बताया कि वे असुरों की सहायता से सागर का मंथन करें, तभी उन्हें सिंधु कन्या के रूप में लक्ष्मी जी पुन: प्राप्त होगी।

Om Sign विष्णु भगवान के कहने से देवताओं ने असुरों को यह समझा दिया कि समुद्र में अमृत का घड़ा और कई बहुमूल्य रत्न मौजूद हैं। इस अमृत को प्राप्त करने के लिए हम सभी को मिलकर सागर-मंथन करना चाहिए ताकि उसे पाने पर अमर हो सकें। देवताओं के इस तरह से समझाने से सभी असुर आसानी से देवताओं के कहने में आ गए और सागर-मंथन को तैयार हो गए।

Om Sign देवताओं और असुरो ने समुद्र मंथन के लिए मंदराचल पर्वत को उठाकर जैसे ही सागर में डाला वो सागर में नीचे की ओर धंसता चला गया, तब भगवान विष्णु ने कच्छप अवतार लेकर उस पर्वत को अपनी पीठ पर रोक लिया।

Om Sign यह देखकर मंदराचल पर्वत हैरत में आ गए कि वो कौन-सी शक्ति है जो हमें नीचे जाने से रोक दे रही है। तभी उन्हें या अहसास हो गया की यह भगवान विष्णु की ही माया है। तब मंदराचल पर्वत को चारों अोर लपेट कर नागों के राजा वासुकि समुद्र का मंथन करने लगे। मंथन करते समय नागराज वासुकि के मुख को स्वयं विष्णु भगवान ने देवताओं के साथ पकड़ा । यह देख कर सभी असुर नाराज हो गए कि हम दैत्यगण नागराज वासुकि के अमंगलकारी पूंछ की तरफ से मंथन नहीं करेंगे ।

Om Sign भगवान विष्णु और सभी देवता भी यही चाहते थे। सभी देवताओं ने मुख की तरफ से हट कर वासुकि की पूंछ पकड़ ली, तत्पश्चात देवताओं और असुरो ने सावधानी के साथ समुद्र का मंथन करने लगे।
समुद्र-मंथन से सबसे पहले 'हलाहल' नामक विष निकला। उस विष से तीनों लोकों में त्राहि त्राहि मच गई, यह देखकरभगवान शंकर ने उस विष का पान कर उसे अपने कंठ में ही रोक लिया, तभी से भगवान शंकर का एक नाम ‘नीलकंठ’ भी हुआ।

Om Sign उस विष के बाद एक के बाद एक अद्भुत चीजें निकलने लगी।

Om Sign सबसे पहले कामधेनु गाय उत्पन्न हुई तत्पश्चात,
Om Sign उच्चै:श्रवा अश्व,
Om Sign ऐरावत हाथी,
Om Sign कौस्तुभ मणि,
Om Sign कल्पवृक्ष,
Om Sign शंख,
Om Sign केतु,
Om Sign धनु,
Om Sign धन्वंतरि,
Om Sign शशि आदि कुल मिलाकर चौदह रत्न सागर के अंदर से निकले थे।

Om Sign इन सबके बाद दशों दिशाओं को अपनी कांति से प्रकाशित करने वाली ‘माँ लक्ष्मी’ उत्पन्न हुईं। माँ महालक्ष्मी की अद्भुत रूप, अद्भुत छटा को देख कर देवता और असुर दोनों ही होश खो बैठे इसलिए कुछ समय के लिए मंथन कार्य रुक गया । सभी देवता और दैत्य लक्ष्मी जी पर मोहित होकर उनकी प्राप्ति की इच्छा करने लगे। उसी समय देवताओं के राजा इंद्र ने लक्ष्मी जी के को सुंदर आसन दिया जिस पर लक्ष्मी माँ विराजमान हो गईं।

Om Sign लक्ष्मी जी के अवतरण होने पर ऋषि मुनियों ने विधिपूर्वक माँ का अभिषेक किया। माँ लक्ष्मी के आने पर क्या देवताओं , ऋषियों, मनुष्यों सभी में हर्ष का वातावरण फ़ैल गया, धरती पर मोर और स्वर्ग में अप्सराएं नाचने लगी , गंधर्वराज गायन करने लगे।

Om Sign तत्पश्चात समुद्र देव ने माँ लक्ष्मी को पीले वस्त्र और विश्वकर्मा जी ने लक्ष्मी जी को कभी ना कुम्हलाने वाला कमल समर्पितसमॢपत किया। मांगलिक वस्त्र और आभूषणों से सुसज्जित होकर माँ लक्ष्मी ने देवताओं और असुरों पर अपनी दिव्य दृष्टि डाली, परन्तु उन्हें उनमें से अपने जीवन साथी के रूप में कोई भी योग्य वर नज़र नहीं आया क्योंकि लक्ष्मी जो को तो भगवान श्री भगवान विष्णु की ही होना था। उन्हें ज्यों ही भगवान श्री हरि दिखाई पड़े, उसी समय उन्होंने अपने हाथों में पकड़ी हुई कमलों की माला को भगवान के गले में डाल दिया।

Om Sign भगवान विष्णु जी के वरण के पश्चात फिर से सागर-मंथन का कार्य शुरू हो गया। उसके बाद अनेक रत्नों की प्राप्ति के बाद भगवान धन्वंतरि अमृत कलश को लेकर प्रकट हुए। अमृत कलश को देखते ही उसको दानवों ने अपने कब्जे में कर लिया। तब घबराये हुए सभी देवता विष्णु भगवान के पास गए।
विश्व के कल्याण के लिए भगवान श्री हरि ने मोहिनी का रूप धारण कर लिया । उनके मोहिनी रूप को देखकर सभी असुर उन पर मोहित होकर अपनी सुध-बुध खो बैठे। फिर मोहिनी रूप धारी भगवान विष्णु ने दैत्यों को अपनी माया से छलते हुए समस्त अमृत को देवताओं में बांट दिया।

Diwali Diye माँ लक्ष्मी की उत्पति की दूसरी कथा Diwali Diye


Om Sign एक अन्य कथा के अनुसार देवी लक्ष्मी जी सप्तर्षियों में एक महर्षि भृगु की पत्नी ख्याति जी के गर्भ से उत्पन्न हुई थीं। पार्वती के पिता राजा दक्ष और महर्षि भृगु दोनों भाई थे। इस प्रकार लक्ष्मी जी भी देवी पार्वती की बहन हुईं। इस कथानुसार जिस प्रकार पार्वती भगवान शिवजी से प्रेम करती थीं और उन्हें पति रूप में पाना चाहती थीं, उसी प्रकार माँ लक्ष्मी भी भगवान विष्णु को बहुत पसंद करती थीं और उन्हें अपने पति रूप में पाना चाहती थीं। लक्ष्मी जी ने अपनी इस इच्छा को पूरा करने के लिए समुद्र तट पर घोर तपस्या की और इसी के फलस्वरूप विष्णु ने उन्हें अपनी पत्नी रूप में स्वीकारा।

Om Sign समुद्र मंथन से उत्पन्न माँ लक्ष्मी को माँ कमला कहते हैं जो दस महाविद्याओं में से अंतीम महाविद्या है।
देवी लक्ष्मी जी का घनिष्ठ संबंध देवराज इन्द्र तथा देवताओं के कोषाध्यक्ष कुबेर से हैं, इन्द्र देवताओं के राजा तथा स्वर्ग के अधिपति हैं तथा कुबेर देव देवताओं के खजाने के रक्षक अर्थात देवताओं के कोषाध्यक्ष है ।
देवी लक्ष्मी ही इंद्र तथा कुबेर को अतुल ऐश्वर्य, वैभव, राजसी सत्ता प्रदान करती हैं।


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No Tips !!!!



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