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Kalash One Imageग्रहण / Grahan, Kalash One Image


 Grahan kyon hota hai,



 ग्रहण की कथा, Grahan ki katha 


 ज्योतिष और खगोलीय शास्त्र में ग्रहण का बहुत महत्व है। चंद्र ग्रहण पूर्णिमा के दिन और सूर्य ग्रहण अमावस्या के दिन होता है। लेकिन क्या आप जानते है कि ग्रहण क्यों होता है , आइये हम आपको बताते है कि ग्रहण के सम्बन्ध में भारतीय धर्म ग्रंथो में क्या कथा है ।

ज्योतिष शास्त्रियों के अनुसार ग्रहण तब होता है जब राहु -केतु सूर्य और चन्द्रमा का ग्रास करते है। राहू और केतु उसी समय उत्पन्न हुए जब समुद्र मंथन हुआ था। स्कन्द पुराण के अवन्ति खंड में उल्लेख है कि उज्जैन राहु और केतु की जन्म भूमि है अर्थात सूर्य और चन्द्रमा को ग्रसित करने वाले ये दोनों छाया ग्रह उज्जैन में ही जन्मे थे।

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ज्योतिष में राहु और केतु को छाया ग्रह कहा जाता है। राहु और केतु ग्रह एक ही राक्षस स्वर्भानु के शरीर से उत्पन्न हुए हैं। उस राक्षस के सिर वाला भाग राहु एवं  धड़ वाला भाग केतु कहलाता है। 

 ज्योतिष शास्त्रियों के अनुसार यह दोनों ही छाया ग्रह आकाश में नहीं दिखते हैं, लेकिन अगर किसी की कुंडली में राहू और केतु अशुभ हों तो जातक को जीवन भर कष्टों का सामना करना पड़ता है । ये दोनों इतने बलशाली हैं कि सूर्य और चन्द्रमा पर ग्रहण भी इन्ही के कारण लगता है।


 शास्त्रों के अनुसार समुद्र मंथन के दौरान जब अमृत निकला तो उसको पाने  के लिए देवताओं और दैत्यों में विवाद होने लगा,  इसको शांत करने के लिए भगवान श्री विष्णु जी ने मोहनी एकादशी के दिन मोहिनी रूप धारण किया। समुद्र मंथन से निकले अमृत का वितरण महाकाल वन में हुआ था। वहाँ पर भगवान विष्णु ने देवताओं और असुरों को अलग-अलग बिठा दिया था ।

 दैत्यों की पक्ति में स्वर्भानु नाम का एक दैत्य भी बैठा हुआ था। उसे यह शक होने लगा  कि मोहिनी रूप को दिखाकर दैत्यों को धोखा दिया जा रहा है अमृत केवल देवताओं को ही पिलाया जा रहा है दैत्यों को नहीं। इसलिए वह चुपचाप देवताओं का रूप धारण कर से सूर्य और चंद्र देव के आकर बैठ गया और उसने भी अमृत प्राप्त कर लिया।  

लेकिन जैसे ही उसे अमृत पीने को मिला सूर्य और चंद्र देवता ने उसे पहचान लिया की वह देवता नहीं वरन दैत्य है और उन्होंने मोहिनी रूप धारण किए भगवान श्री विष्णु को तुरंत इसके बारे में बता दिया । इससे पहले ही स्वर्भानु अमृत को अपने गले से नीचे उतारता विष्णु जी ने अपने सुदर्शन चक्र से उसी पल उसका सिर धड़ से अलग कर दिया। लेकिन चूँकि उसके मुख में अमृत जा चुका था इसलिए उसकी मृत्यु नहीं हुई और वह भी देवताओं के समान अमर हो गया। 

 शास्त्रों के अनुसार ब्रह्मा जी ने उस कटे हुए दैत्य के सिर को एक साँप के शरीर से ( धड़ से ) जोड़ दिया जो राहु कहलाया और,

उस दैत्य के धड़ को साँप के सिर से  जोड़ दिया जो केतु कहलाया। 

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पौराणिक कथाओं के अनुसार सूर्य और चंद्र देवता द्वारा स्वर्भानु दैत्य की पोल खोले जाने के कारण वह दैत्य अर्थात राहु-केतु इन दोनों देवताओं सूर्य और चन्द्रमा के बैरी हो गए। इसलिए इनके समय समय पर राहु के सूर्य को और केतु के चन्द्रमाँ को ग्रसने के कारण क्रमशः सूर्य ग्रहण और चंद्र ग्रहण होते है। 

शास्त्रों के अनुसार राहु और केतु नवग्रहों के न्यायाधीश शनि देव के आदेश पर कार्य करते हैं। ‍राहु का रंग काला और केतु का सफेद माना जाता है। शरीर में इनके अलग अलग स्थान हैं। मनुष्य के शरीर में सिर राहु है तो धड़ को केतु का स्थान माना जाता है। 

यदि आपके गले एवं इससे ऊपर सिर तक किसी भी प्रकार की गंदगी आदि है तो आप पर राहु का प्रकोप होगा राहु का विशेषकर सिर और ठोड़ी पर प्रभाव होता है , और यदि फेफड़ें, पेट आदी में कोई परेशानी  विकार है तो आप केतु से पीड़ित हो सकते हैं। केतु का रीढ़, घुटने, कमर,  लिंग और जोड़ पर प्रभाव होता है।


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Published By : MemoryMuseum
Updated On : 2018-08-09 14:16:31




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