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देवताओं की होली

मेष राशि

देवताओं की होली

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Kalash One Image होली 2018 Kalash One Image
Kalash One Image Holi 2018 Kalash One Image


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Kalash One Image देवताओं की होली Kalash One Image
Kalash One Image Devtaon ki holi Kalash One Image


Kalash One Image होली हिन्दुओं का एक प्रमुख त्योहार है इसको अति प्राचीन काल से मनाया जा रहा है। हिन्दुओं के बहुत से ग्रंथो में इसका उल्लेख्य हुआ है। देश के बहुत से प्राचीन, पौराणिक मंदिरों की दीवारों पर भी होली का चित्रण मिलता हैं। ऐसा ही एक मंदिर विजयनगर की राजधानी हंपी में है जो 16वीं सदी का माना जाता है,
जानिए देवताओं की होली, Devtaon ki holi ।

Kalash One Image इस मंदिर में होली के बहुत से दृश्य चित्रित है हैं जिसमें राजकुमार, राजकुमारी अपने दास-दसियों सहित एक दूसरे पर रंग लगा रहे हैं। इसके अतिरिक्त कई मध्ययुगीन तस्वीरें में भी, जिनमें 16वीं सदी के अहमदनगर चित्र, बूंदी के लघु चित्र, मेवाड़ की पेंटिंग सब में अलग अलग तरह से होली का चित्रण किया गया है।

Kalash One Image पुराणों में भगवान श्री कृष्ण जी द्वारा भी होली खेलने के बारे में बहुत जगह वर्णन मिलते है। बचपन में पूतना के द्वारा जहरीला दूध पिलाने के कारण भगवान श्रीकृष्ण का रंग गहरा नीला हो गया था। अपने इस रंग के कारण वे खुद को दूसरो से अलग महसूस करने लगे, भगवान श्रीकृष्ण को लगने लगा कि उनके इस रंग की वजह से राधा और गोपियां कोई भी उन्हें पसंद नहीं करेंगी।
चूँकि भगवान श्री कृष्‍ण सांवले थे लेकिन राधा रानी बहुत ही सुंदर और गोरी थी। इसी बात को लेकर भगवान श्री कृष्‍ण सदैव अपनी माता यशोदा से शिकायत करते थे और इसका कारण भी जानना चाहते थे कि, “मइया, इतनी गोरी कैसे है मैं इतना काला क्‍यों हूँ ।“

Kalash One Image एक दिन माता यशोदा ने भगवान श्री कृष्‍ण को सुझाव दिया कि वे राधा को जिस रंग में देखना चाहते हैं उसी रंग को जाकर राधा के मुख पर लगा दे। भगवान श्री कृष्‍ण इस बात से बहुत प्रसन्न हुए। वे तो वैसे भी काफी नटखट स्‍वभाव के थे, इसलिए उन्होंने राधा को तरह-तरह के रंगों से रंगने के लिए मन में ठान ली ।

Kalash One Image श्री कृष्ण भगवान ने राधा के पास जाकर उन्हें अचानक ही रंग से रंग दिया उसके बाद वे अन्य गोपियों को भी रंग लगाने लगे। अचानक घटी इस घटना से राधा और अन्‍य गोपियों का रोम रोम हर्ष से पुलकित हो गया फिर तो सभी ग्वाल बाल और गोपियाँ एक दूसरे को तरह-तरह के रंगों से रंगने लगे।
नटखट श्री कृष्‍ण की इस प्रेममयी शरारत से सभी लोग इतने हर्षित हुए कि तब से ये घटना एक परंपरा बनकर होली के रूप में स्‍थापित हो गई, और इसे हर्ष, उल्लास और प्रेम के उत्सव के रूप में मान्यता मिल गयी।

Kalash One Image या भी माना जाता है कि इसी दिन से रंग खेलने का प्रचलन शुरू हो गया और उसके बाद श्रीकृष्ण राधा और गोपियों–ग्वालों के बीच की होली गुलाल, फूलो और केसर से खेलने की शुरुआत हो गयी। इसीलिए होली पर रंग खेलने की ये परम्‍पना आज भी जारी है। प्रत्येक वर्ष सभी ब्रज वासी बड़ी ही बेसब्री से इस पर्व का इंतेज़ार करते थे और इसके लिए काफी पहले से ही तैयारी करनी शुरू कर देते थे।

Kalash One Image कहते है कि होली पर भगवान श्री कृष्ण और उनके सखा पूरे गांव में सबके साथ मज़ाक भरी शैतानियां करते थे। होली पर अपने कृष्ण के संग उनके रंग में रंगे ब्रजवासी भी होली खेलने के लिए हुरियार बन जाते थे और ब्रज की नारियाँ हुरियारिनों के रूप में फिर चारों ओर बस एक ही स्वर सुनाई देता था

Kalash One Image आज बिरज में होली रे रसिया, होली रे रसिया, बरजोरी रे रसिया।
उड़त गुलाल लाल भए बादर, केसर रंग में बोरी रे रसिया।

Kalash One Image धीरे धीरे होली की धार्मिक और सामाजिक मान्यता बढ़ती ही गयी। आज भी ब्रज की होली का कोई मुकाबला नहीं है।

Kalash One Image होली का आरम्भ फाल्गुन शुक्ल नवमी बरसाना से होता है। बरसाना की लठामार होली तो पूरे विश्व में प्रसिद्ध है। इसके पहले हुरंगे चलते हैं, जिनमें महिलायें रंगों के साथ लाठियों, कोड़ों आदि से पुरुषों को घेरती हैं। इसी के साथ पूरे ब्रज में होली की धूम मचती है। दशमी के दिन ऐसी ही होली नन्दगांव में होती है। धूलेंड़ी को तरह तरह के रंगो से होली खेली जाती है।

Kalash One Image ब्रज में होली का प्रव लगभग एक हफ्ते तक चलता है और रंगपंचमी पर खत्म होता है।

Kalash One Image शास्त्रों में भगवान श्रीराम और सीता माता का भी होली खेलने के बारे में उल्लेख मिलता है। होली में एक ओर भगवान श्री राम, लक्ष्मण जी भरत और शत्रुघ्न होते थे वही दूसरी ओर सहेलियों के संग माँ सीता जी। उस समय केसर मिला, फूलो के रंग के से होली खेली जाती थी । दोनों ओर से खूब रंग डाला जाता था। प्रजा भी अपने देवता अपने राजा से होली खेलने आती थी इस मनोरम दृश्य को देखकर देवतागण भी आकाश से फूल बरसाने थे। एक जगह लिखा है :- खेलत रघुपति होरी हो, संगे जनक किसोरी
इत राम लखन भरत शत्रुघ्न, उत जानकी सभ गोरी, केसर रंग घोरी।

Kalash One Image शास्त्रों में कुछ एक स्थानों में राधा-कृष्ण और सीता-राम की होली के साथ साथ हिमालय में शिव - पार्वती की होली के बारे में भी लिखा है?
शरीर में भस्म लगाकर, ललाट पर चंद्रमा, शरीर में लिपटी मृगछाला, चमकती हुई आँखें जिसमें सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड समाया हुआ है, गले में लिपटा हुआ सर्प, जटाओं में गंगा को लिए हुए नंदी की सवारी में भगवान शिव जब अपने गणो के साथ निकलते है तो इस मनोहारी दृश्य को देखकर लोगो की आँखे खुली खुली रह जाती है।
माँ पार्वती सबसे पहले महादेव को रंग लगाकर भाव विभोर हो जाती है फिर उनकी सहेलियों भी पार्वती जी को रंग गुलाल से सराबोर कर देती हैं।

Kalash One Image देखिए इस अद्भुत दृश्य की झाँकी :-
आजु सदासिव खेलत होरी जटा जूट में गंग बिराजे अंग में भसम रमोरी
वाहन बैल ललाट चरनमा, मृगछाला अरू छोरी।
भगवान शिव जी के साथ उनके असंख्य गणो और भूत-प्रेतों की टोलियाँ भी नाचते गाते होली खेल रही है। आक, धतूरा, भांग, संखिया आदि खूब पिया जा रहा है, इन गणो का हुजूम एक दूसरे को रंग लगाने की बजाय स्वयं को ही रंग लगा कर लगा कर आनंदित हो रहे है, जिसे देखकर स्वयं माँ पार्वती जी और उनकी सखियाँ भी हँस रही हैं।
इस प्रकार यह स्पष्ट है कि मनुष्य तो मनुष्य देवताओं में भी होली के प्रति बहुत आकर्षण है और इसी लिए यह मान्यता भी है कि होली खेलने से सुख-सौभाग्य की प्राप्ति होती है।

Published By : Memory Museum
Updated On : 2018-02-23 02:45:55 PM


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ज्योतिषाचार्य डॉ० अमित कुमार द्धिवेदी
कुण्डली, हस्त रेखा, वास्तु
एवं प्रश्न कुण्डली विशेषज्ञ


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