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भाद्रपद माह की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को चंद्र दर्शन का पाप



चतुर्थी को चंद्र दर्शन के उपाय



Kalash One Imageदूसरी कथा :-भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को चंद्र-दर्शन होने का दोष निवारण

शास्त्रों में एक और कथा कही गयी है जिसको कहने सुनने से इस दोष का निवारण हो जाता है ।

Kalash One Image सत्राजित् नाम के एक यदुवंशी ने सूर्य भगवान को तप से प्रसन्न कर स्यमंतक नाम की दिव्य मणि प्राप्त की थी। वह मणि प्रतिदिन स्वर्ण प्रदान करती थी। वह मणि बहुत ही दिव्य थी । उस मणि के प्रभाव से उस राज्य में रोग, चोरी, पाप, अग्नि, अकाल, अतिवृष्टि आदि का भय नहीं रहता था। एक दिन सत्राजित् राजा उग्रसेेन के दरबार में गया । वहां पर भगवान श्रीकृष्ण भी उपस्थित थे। उन्होंने सोचा कि यदि यह मणि अगर राजा उग्रसेन के पास होती तो कितना अच्छा होता। यह बात किसी तरह सत्राजित् को मालूम पड़ गई। इसलिए उसने यह मणि अपने भाई प्रसेन को दे दी।

Kalash One Image एक दिन जब सत्राजित् का भाई प्रसेन जंगल गया तो वहां पर सिंह ने उसे मार डाला। जब प्रसेन वापस नहीं लौटा तो लोगों को यह आशंका हुई कि चूँकि श्रीकृष्ण shri krishn जी उस मणि को चाहते थे शायद इसलिए उन्होंने प्रसेन को मारकर वह मणि ले ली होगी। लेकिन वह मणि सिंह के मुंह में ही रह गई थी । फिर जाम्बवान ने शेर को मारकर वह मणि ले ली।

Kalash One Image उधर जब भगवान श्रीकृष्ण shri krishn को यह मालूम पड़ा कि उन पर मणि चुराने का मिथ्या आरोप लग रहा है तो वे सच्चाई का पता लगाने जंगल में चले गए। ढूंढ़ते ढूंढ़ते वाल जाम्बवान की गुफा तक जा पहुंचे और वहाँ पर जाम्बवान से मणि लेने के लिए उन्होंने उसके साथ 21 दिनों तक घोर संग्राम किया। अंत में जाम्बवान समझ गया कि यह कोई साधारण मानव नहीं श्रीकृष्ण तो साक्षात ईश्वर ही है जो त्रेता युग में भगवान श्रीराम के रूप में उनके स्वामी थे।

Kalash One Image इस ज्ञान को प्राप्त करने के बाद जाम्बवान ने तब खुशी-खुशी वह मणि भगवान श्रीकृष्ण को दे दी तथा अपनी पुत्री जाम्बवंती का विवाह भी उनसे करवा दिया। वह मणि लेकर भगवान श्रीकृष्ण shri krishn ने पुन: सत्राजित् को लौटा दी। सत्राजित् मणि पाकर और सच्चाई जानकर बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने भी खुश होकर अपनी पुत्री सत्यभामा का विवाह प्रभु श्रीकृष्ण shri krishn के साथ कर दिया।



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