Home Hindi वास्तुशास्त्र शौचालय -स्नानघर का वास्तु

शौचालय -स्नानघर का वास्तु

किसी भी भवन में शौचालय और स्नानघर अत्यंत ही महत्वपूर्ण होता है । इसको भी वास्तु सम्मत बनाना ही श्रेयकर है वरना वहाँ के निवासियों को जीवन भर अनेकों परेशानियों का सामना करना पड़ता है। यहाँ पर शौचालय और स्नानघर के लिए बताये गए वास्तु नियम आपके लिए अवश्य ही लाभदायक होंगे ।

1. आज कल घरों में स्थानाभाव, शहरी संस्कृति, शास्त्रों के अल्प ज्ञान के कारण अधिकतर शौचालय और स्नानघर एक साथ बने होते है लेकिन यह सही नहीं है इससे घर में वास्तुदोष होता है। इससे घर में परिवार के सदस्यों के बीच अक्सर मतभेद और वाद-विवाद होता रहता है ।

वास्तु शास्त्र के प्रमुख ग्रंथ विश्वकर्मा प्रकाश के अनुसार भवन के पूर्व दिशा में स्नानघर और दक्षिण, नैऋत्य (दक्षिण-पश्चिम) दिशा के बीच में शौचालय होना चाहिए। लेकिन यह दोनों एक ही साथ में होने से वास्तु का यह नियम टूटता है।

2. वास्तुशास्त्रियों के अनुसार स्नानघर में चंद्रमा तथा शौचालय में राहू का वास होता है। इसलिए यदि किसी भवन में दोनों एक एक साथ बने हैं तो चंद्रमा और राहू एक साथ होने से चंद्रमा में दोष आ जाता है। इससे घर के निवासियों को शारीरिक, मानसिक और आर्थिक परेशानियाँ उठानी पड़ सकती है।

3. अलग अलग शौचालय और स्नानघर बनाने पर स्नानघर उत्तर एवं पूर्व दिशा में और शौचालय दक्षिण, पश्चिम, दक्षिण और नैत्रत्य के बीच में बनाये जाने चाहिए। लेकिन दोनों को एक साथ संयुक्त रूप से बनाने पर उन्हें पश्चिमी और उत्तरी वायव्य कोण में बनाना श्रेष्ठ है । इसके अतिरिक्त यह पश्चिम, दक्षिण और नैत्रत्य के बीच भी बनाये जा सकते है ।

4. शौचालय और स्नानघर उपरोक्त किसी भी दिशा में बनाये लेकिन यह ध्यान रखें बाथरूम में फर्श का ढाल, पानी का बहाव उत्तर एवं पूर्व दिशा की ओर ही होना चाहिए।

5. शौचालय में बैठने की व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए कि शौच करते समय आपका मुख दक्षिण या पश्चिम दिशा की ओर होना चाहिए। पूर्व में कभी भी नहीं, क्योंकि पूर्व सूर्य देव की दिशा है और मान्यता है कि उस तरफ मुँह करके शौच करते हुए उनका अपमान होता है । इससे जातक को क़ानूनी अड़चनों एवं अपयश का सामना करना पड़ सकता है ।

6. संयुक्त शौचालय और स्नानघर बनाने या केवल अलग ही स्नानघर पर यह अवश्य ही ध्यान दें कि उसमें पानी के नल, नहाने के शावर ईशान, उत्तर एवं पूर्व दिशा में ही लगाये जाय और नहाते समय जातक का मुँह उत्तर, ईशान अथवा पूर्व की तरफ ही होना चाहिए ।

7. यहाँ पर ब्रश/मँजन करते हुए भी मुँह उत्तर अथवा पूर्व की तरफ ही होना चाहिए ।

8. इसी तरह संयुक्त शौचालय और स्नानघर बनाने या केवल अलग से ही शौचालय बनाने पर यह भी अवश्य ध्यान दें कि शौचालय की सीट वायव्य कोण एवं पश्चिम की तरफ ही बनाये इसके अतिरिक्त दक्षिण दिशा भी एक विकल्प हो सकती है ।

9. यदि स्नानघर में बाथटब लगाना हो तो उसे उत्तर, पूर्व या ईशान कोण में लगाया जाना चाहिए ।

10. संयुक्त शौचालय और स्नानघर अथवा केवल स्नानघर में बिजली के उपकरण, स्विच बोर्ड अग्नेय कोण अथवा दक्षिण दिशा में लगाने चाहिए ।

11.यदि वहाँ पर वाशिंग मशीन भी रखनी हो तो उसे भी दक्षिण अथवा अग्नेय कोण में रखना चाहिए ।

इसकी दीवारों में सफ़ेद, हल्का नीला, आसमानी अथवा हल्का पीला रंग करवाना चाहिए ।

12.अलग अलग शौचालय और स्नानघर बनवाने पर स्नानघर का द्वार पूर्व एवं उत्तर में और शौचालय का द्वार पूर्व और अग्नेय दिशा की ओर खुलना चाहिए ।

13.स्नानघर में दर्पण उत्तर या पूर्व की दीवार में लगवाना चहिये लेकिन दक्षिण, पश्चिम की दीवार में दर्पण को लगाने से यथासंभव बचना चाहिए ।

14.आजकल बेडरूम में अटैच बाथरूम का चलन होता जा रहा है या भी गलत है। इससे बेडरूम और बाथरूम की ऊर्जाओं के टकराव से हमारा स्वास्थ्य शीघ्र ही प्रभावित होता है । इससे बचने के लिए या तो बेडरूम में अटैच बाथरूम के बीच एक चेंज रूम बनाया जाय अथवा इस बाथरूम पर एक मोटा पर्दा डाला जाय और इस बात का भी ख्याल रहे कि बाथरूम का द्वार उपयोग के पश्चात बंद करके ही रखा जाय ।

15.यहाँ पर खिड़की उत्तर या पूर्व में देना उचित है, इसे पश्चिम में भी बना सकते है लेकिन इसे दक्षिण और नैत्रत्य कोण में बिलकुल भी नहीं बनवाना चाहिए ।

16.इसमें एग्जास्ट फैन को पूर्व या उत्तर दिशा की दीवार पर लगवाना चाहिए ।

17.यदि भवन में कहीं भी नल टपकते हो तो उसे तुरंत ही ठीक करवाना चाहिए। अगर भवन में कहीं भी सीलन हो तो उसे भी तुरंत ही ठीक करवाएं। साथ ही समय समय पर पानी टंकियों की साफ-सफाई भी जरूर करवाते रहे ।इससे भवन के सदस्यों को कभी भी आर्थिक परेशानियां नहीं सतायगी ।

18.यह भी ध्यान दे कि इसका द्वार रसोईघर के द्वार के सामने कतई ना खुले । अथवा इसकी दीवार और रसोईघर की दीवार एक नहीं होनी चाहिए ।

19.यदि शौचालय और स्नानघर का निर्माण वास्तु अनुरूप नहीं है तो इसके बाहर एक बड़ा आइना लगाये । शिकार करते हुए शेर या मुँह फाड़े हुए शेर का चित्र लगाने से भी इसके वास्तु दोषो में कमी आती है ।

20.यहाँ पर चूँकि साबुन, पानी आदि का उपयोग होता है अत: इसमें संगमरमर का प्रयोग करने से बचना चाहिए, यह खतरनाक हो सकता है । 678 Shares facebook sharing button Share whatsapp sharing button Share

Published By : Memory Museum
Updated On : 2019-11-24 06:00:55 PM

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