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तुलसी विवाह

tulsi-vivah

om तुलसी विवाह
tulsi vivah om


chhath-parvi


om तुलसी विवाह का महत्व
tulsi vivah ka mahatvaom


हिन्दू धर्म शास्त्रो में तुलसी का बहुत महत्व है। शास्त्रो में तुलसी जी को "विष्णु प्रिया" कहा गया है। विष्णु जी की पूजा में तुलसी का प्रयोग अनिवार्य है। भगवान विष्णु को तुलसी अर्पित किये बिना उनकी पूजा अधूरी मानी जाती है। हिन्दू धर्म में दोनों को पति-पत्नी के रूप में माना गया है। कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी को भगवान श्री विष्णु जी और तुलसी जी का विवाह कराया जाता है।
शास्त्रो के अनुसार तुलसी विवाह में तुलसी के पौधे और भगवान श्री विष्णु जी की मूर्ति अथवा शालिग्राम पत्थर का वैदिक रीति से, पूर्ण विधि विधान से विवाह कराने से अतुलनीय पुण्य प्राप्त होता है ।

तुलसी हर घर में होती है , तुलसी की सेवा , पूजा करना महान पुण्यदायक माना जाता है। शास्त्रो के अनुसार हर जातक को जीवन में एक बार तुलसी विवाह तो अवश्य ही करना चाहिए। इससे इस तुलसी जी का विवाह भगवान विष्णु जी के प्रतीक शालिग्राम जी से किया जाता है। तुलसा जी व शालिग्राम जी का विवाह कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी, देवोत्थान एकादशी को किया जाता है। देवोत्थान एकादशी के दी भगवान श्री विष्णु क्षीर सागर से जागते है और इसी दिन से समस्त मांगलिक कार्य प्रारम्भ हो जाते है।

तुलसी विवाह से लाभ
Tulsi vivah se labh



देवोत्थान एकदशी के दिन तुलसी विवाह ( tulsi vivah ) कराने अथवा तुलसी जी की पूर्ण श्रद्धा से पूजा आने से परिवार में यदि किसी की शादी में विलम्ब होता है तो वह समाप्त होता है विवाह योग्य जातक का शीघ्र एवं उत्तम विवाह होता है ।

तुलसी विवाह ( tulsi vivah ) / तुलसी पूजा से जातक को वियोग नहीं होता है, बिछुड़े / नाराज सेज संबंधी भी करीब आ जाते हैं।

जिन जातको की कन्या नहीं है उन्हें विधिपूर्वक तुलसी विवाह ( tulsi vivah ) / तुलसी पूजा अवश्य ही करनी चाहिए इससे उन्हें कन्यादान का पूर्ण फल प्राप्त होता है ।

देवोत्थान एकादशी के दिन तुलसी विवाह / तुलसी पूजा से जातक को इस पृथ्वी में सभी सुख प्राप्त होते है , उसके जीवन में कोई भी संकट नहीं आता है, उसे भगवान श्री विष्णु एवं तुलसी माँ की पूर्ण कृपा मिलती है।

तुलसी विवाह की कथा
Tulsi vivah ki katha



शास्त्रो के अनुसार अगर जातक तुलसी विवाह नहीं कराते है तब भी प्रबिधिनी एकादशी के दिन तुलसी विवाह ( tulsi vivah ) के प्रसँग को पढ़ने / सुनने से विष्णु भगवान के साथ साथ तुलसी माँ की भी पूर्ण कृपा प्राप्त होती है, घर से रोग, नकारात्मक ऊर्जा दूर रहती है, परिवार में प्रेम और समस्त कार्यो में सफलता मिलती है।

om तुलसी माँ का जन्म राक्षस कुल में हुआ था , उनका नाम वृंदा रखा गया था। वृंदा बचपन से ही भगवान श्री विष्णु जी की परम भक्त थी एवं पूरे मन से उनकी पूजा अर्चना किया करती थी.। विवाह योग्य होने पर वृन्दा का विवाह राक्षस कुल में दानव राज जलंधर से हो गया। राक्षस राज जलंधर ने समुद्र से जन्म लिया था। वृंदा बड़ी ही पतिव्रता स्त्री थी।

om एक बार देवताओं और दानवों में बहुत भयंकर युद्ध हुआ। जब जालंधर युद्ध के लिए जाने लगा तो वृंदा ने कहा -स्वामी आप युद्ध करने जा रहे हैं और आप जब तक युद्ध करते रहेंगे मैं आपकी सलामती के लिए, आपकी जीत के लिए पूजा करती रहूँगी, और आपकी जीत तक मैं अपना संकल्प नही छोडूगीं। वृन्दा के ब्रत के कारण जलंधर परम शक्तिशाली होकर देवताओं को बूरी तरह से हराने लगा। कोई भी देवता उसके सामने टिक नहीं पा रहा था , तब सभी देवतागण एकत्रित होकर अपनी सहायता के लिए भगवान विष्णु के पास गए और उनसे मदद की गुहार की ।

om भगवान विष्णु धर्म संकट में आ गए क्योंकि वृन्दा उनकी अन्यय भक्त थी और उन्ही ई पूजा में रमी थी और उधर देवतागण उनसे मदद माँग रहे थे । भगवान श्री विष्णु जी ने देवताओं से कहा कि हे देवतागण वृन्दा मेरी परम भक्त है और मैं अपने भक्त के विरुद्ध कैसे जा सकता हूँ, देवताओं के बहुत विनय करने पर अंततः भगवान विष्णु ने उन्हें मदद का आश्वासन दिया। भगवान विष्णु जानते थे कि जब तक वृंदा का अनुष्ठान नहीं रुकेगा तब तक जालंधर को कोई भी परास्त नहीं कर पायेगा ।

om विष्णु जी ने वृन्दा को पूजा से हटाने के लिए उनके पति जलंधर का रूप धारण करके वृंदा के समक्ष गए । वृंदा अपने पति जलंधर को सकुशल सामने देखकर अपनी पूजा को समाप्त करके उनके चरण छूने उठ गयी और जैसे ही वृंदा का संकल्प टूटा, उसी समय देवताओं ने जलंधर को मारकर उसका सिर धड़ से अलग कर दिया। जलंधर का कटा हुआ सिर वृंदा के पास गिरा ।
वृंदा सोच में पड़़ गयी की अगर यह मेरे पति का सिर है तो जो मेरे सामने खड़े है ये कौन है? तब भगवान विष्णु अपने रूप में वापस आ गए और सिर झुकाकर खड़े हो गए ।

om जब वृंदा को मालूम हुआ की उसके पति जलंधर का वध हो गया है तो वह विलाप करने लगी और उन्होंने विष्णु जी को श्राप दिया कि आपने मुझसे छल किया है आप पत्थर के हो जाओगे । पतिव्रता नारी वृंदा के श्राप के कारण भगवान उसी क्षण पत्थर के हो गए । यह देखकर तीनो लोको में हाहाकार मच गया। माँ लक्ष्मी भी रोते हुए सभी देवताओं के साथ वृन्दा से प्रार्थना करने लगी तब वृन्दा ने भगवान को उनके रूप में वापस कर दिया और अपने पति के शरीर के साथ सती हो गयी ।
जहाँ पर वृन्दा सती हुई थी उस जगह उसकी राख से एक पौधा निकला जिसका नाम भगवान विष्णु जी ने तुलसी रखा । विष्णु जी ने कहा कि तुलसी मेरी परम भक्त थी अतः जिस घर में तुलसी लगी होगी, जहाँ पर प्रात: एवं सांय तुलसी की पूजा होगी उस घर में मेरी भी अवश्य ही कृपा बनी रहेगी है। मेरा एक रूप इस पत्थर के रूप में रहेगा जिसे तुलसी जी के साथ शालिग्राम के नाम से पूजा जाएगा एवं मेरी पूजा बिना तुलसी के पूर्ण नहीं होगी ।

om तभी से सभी लोको में तुलसी जी की पूजा होने लगी। कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की देवउठनी एकादशी को तुलसी जी का विवाह शालिग्राम जी के साथ में किया जाता है इस दिन को तुलसी विवाह के रूप में भी मनाया जाता है।

om शास्त्रो के अनुसार जो जातक कार्तिक की देवउठनी एकादशी को तुलसी - शालिग्राम विवाह कराते है अथवा इस दिन तुलसी जी को वस्त्र अर्पित करते हुए पूर्ण विधि विधान से उनकी पूजा करते है, इस दिन भगवान सत्यनारायण की कथा सुनते है उनको अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है। उनके समस्त पापो का नाश होता है, उनके घर कारोबार में सदैव शुभ-मंगल का वातावरण होता है, उन्हें इस मृत्यु लोक में किसी भी चीज़ का आभाव नहीं रहता है तथा अंत में वह विष्णु लोक को जाते है ।

तुलसी विवाह कैसे करें / तुलसी विवाह की विधि
Tulsi vivah kaise kare / Tulsi vivah ki vithi



om अगर कोई जातक तुलसी विवाह अच्छी तरह से करना चाहता है तो पंडित या ब्राह्मण को बुलाया जा सकता है अन्यथा "ऊं तुलस्यै नम:" मन्त्र के उच्चारण के साथ स्वयं भी तुलसी विवाह को संपन्न करा सकते है ।

om तुलसी विवाह ( tulsi vivah ) / तुलसी माता की पूजा करने से पहले परिवार सहित नहा कर साफ सुथरे पीले या लाल वस्त्र धारण करें ।

om देवोत्थान एकादशी, तुलसी विवाह के दिन तुलसी माता के पौधे को गेरू या चूने से अच्छी तरह से सजा लें।

om अब इस तुलसी के पौधे को अपने कमरे / आँगन / छत के बीच में रखे ।

om इसके बाद तुलसी के पौधे को एक लाल रंग की चुनरी अवश्य ही पहना दें।

om गमले के चारों ओर गन्नों को खड़ा करके विवाह का मंडप बनाएं एवं उसे साड़ी,फूल आदि से सजा लें । अगर मण्डप नहीं सजा रहे हो तो गमले को ही फूल माला से सजा लें।

om अब तुलसी के पौधे पर सुहाग की समस्त सामग्री चढ़ा लें।

om तुलसी के गमले में शालिग्राम जी रखें यदि शालिग्राम ना हो तो भगवान श्री विष्णु जी की मूर्ति या फोटो रखे ।

om अब तुलसी जी और शालिग्राम जी पर हल्दी को दूध में भिगो कर उसे लगाएं।

om अगर आपने मंडप बनाया है तो उस मंडप पर भी हल्दी का लेप करें ।

om भगवान श्री विष्णु जी पर तिल चढ़ाएं , उन पर चावल नहीं चढाएं ।

om अब सबसे पहले भगवान श्री गणेश जी का ध्यान करें, तत्पश्चात भगवान श्री विष्णु एवं तुलसी जी को आँवला, सिंगाड़े, गन्ना, फल, पीले फूल, मिष्ठान, मीठा पान, लौंग, इलाइची, बताशा, बेर, चने की भाजी, भीगी चने की दाल एवं नारियल एवं जो भी प्रशाद भी बनाया हो उसे चढ़ाकर ॐ नमो भगवते वासुदेवाये एवं ॐ तुलस्यै नमः का जाप करते रहे।

om अब धूप, अगरबत्ती, घी का दीपक जलाकर अन्य देवी देवताओं का भी आह्वाहन करें ।

om इसके बाद भगवान शालिग्राम जी अथवा भगवान श्री विष्णु जी की मूर्ति को अपने हाथो में लेकर तुलसी माता के पौधे की सात बार परिक्रमा करें, परिक्रमा करते समय लगातार मन्त्र का जाप करते रहे ।

om फिर कन्यादान का संकल्प करते हुए भगवान श्री विष्णु जी से प्रार्थना करें – कि हे परम पिता परमेश्वर ! आप इस तुलसी को विवाह की विधि से ग्रहण कीजिये। आपको तुलसी जी अत्यंत प्रिय है अतः मैं इसे आपकी सेवा में अर्पित करता हूँ। हे प्रभु इसे स्वीकार करें एवं इस विवाह में मेरे द्वारा जो भूल हुई हो उसे क्षमा करके मेरे और मेरे परिवार पर सदैव अपनी कृपा बनाये रखे । हे प्रभु अब आप तुलसी जी को अपने साथ लेकर अपने बैकुंठ धाम में पधारें।

om तुलसी विवाह में कन्यादान अवश्य ही करना चाहिए । इसमें ब्राह्मण को फल, अन्न, वस्त्र, बर्तन, दक्षिणा आदि जो भी संभव हो अवश्य ही दान देना चाहिए। तुलसी विवाह / पूजा में ब्राह्मण के बाद ही यह धार्मिक क्रिया पूर्ण मानी जाती है।

om परिक्रमा के बाद भगवान श्री विष्णु एवं तुलसी जी की कपूर से आरती करें। एवं आरती के पश्चात प्रशाद सभी लोगो में बाँटे।

om इस प्रकार देवोत्थान एकादशी के दिन इस विधि को करने से तुलसी विवाह संपन्न होता है।



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