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सत्कर्मों का महत्व


सदैव ध्यान रहे कि हमारा जन्म एक विशेश उद्देश्य के लिये हुआ है, इस प्रकृति में कोई भी रचना व्यर्थ नही है। प्रत्येक मनुष्य को जीवन में धर्म एवं अपने कर्त्तव्यों का पालन करना चाहिये तभी उसे जीवन में सफलता प्राप्त होती हे। सफलता का कोई भी शार्टकट नही होता है शार्टकट में जरूर जोखिम, अधर्म, बुराई एवं हानि होती है। चाहे आप किसी भी धर्म के मानने वाले हो प्रत्येक धर्म का अर्थ ही मानव जीवन का कल्याण है। हर धर्म हमें अच्छाई, सदाचार, सत्य, अंहिसा एवं स्नेह की शिक्षा देता है। धर्म का अर्थ ही बुरे कार्यों से दूर रहकर निष्ठा से अपने कर्मों एवं कर्त्तव्यों का पालन करना है और स्मरण रहे हमारे सत्कर्मों से ही हमारे भाग्य, हमारे भोग एवं योनियों में बदलाव होता है। अगर हम सभी लोग अपने-अपने धर्म अर्थात सतआचरण का पालन करें तो हमें कभी भूलकर भी पछताना नहीं पड़ेगा।

हमारी आज की दशा में हमारे इस जन्म तथा पिछले जन्मों के कार्यों का भी योगदान रहता है। हमारे कार्यों, कृत्यों का हमारे पूरे परिवार, हमारे वंश पर भी प्रभाव पड़ता है।

हमें अपने माता-पिता, गुरूजनों एवं सभी बड़ों के प्रति आदर, श्रद्धा, कृतज्ञता एवं अपने से छोटों के प्रति प्रेम एवं स्नेह का भाव रखना चाहिये। हमें अपने परिवार एवं पूर्वजों की कभी भी अनदेखी नहीं करनी चाहिये उनके प्रति अपने कर्त्तव्यों का पालन ही सच्चा धर्म है, इसी में सर्वाधिक पुण्य एवं आत्मसन्तोष है। पित्तरों के प्रति कृतज्ञता, आदर, श्रद्धा, सम्मान देने तथा उनका स्मरण करने से वह ना केवल प्रसन्न होकर हमें आशीर्वाद ही प्रदान करते हैं वरन् अपने वंशजों को सुखी एवं सक्षम बनाने हेतु सदैव तत्पर भी रहते है। यह कोई अन्धविश्वास नही है वरन् पूरे विश्व में प्रत्येक धर्म में हजारों उदाहरण एवं प्रमाण भी है जब पित्तरों ने अपने वंशजों की साक्षात में भी मदद की है।

हमारे पित्तर वह शक्ति, वह दिव्य आशीर्वाद, वह प्रकाशपुंज है जो सदैव अपने वंश को फलता-फूलता, आगे बड़ता एवं विकसित होता देखना चाहते है तथा यह भी चाहते है कि उनका तथा उनके वंश का नाम रौशन हो।

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