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स्त्रियों के बारे में महत्वपूर्ण बातें


स्त्रियों के बारे में सभी धर्मों के अनेकोँ धर्म ग्रंथों में कई महत्वपूर्ण बातें कही गयी गई हैं। कुछ ग्रंथों में स्त्रियों के कर्तव्यों का वर्णन, तो कुछ में उनके व्यवहार के बारे में बतलाया गया है। इसी प्रकार महाभारत के अनुशासन पर्व में भी स्त्रियों के संबंध में कई महत्वपूर्ण बातों का वर्णन किया गया है। यह बातें तीरों की शैय्या पर लेटे हुए भीष्म पितामाह ने युधिष्ठिर को बताई हैं। इनमें से कुछ बातें बहुत रोचक हैं और आज के समय में भी बिल्कुल सटीक बैठती हैं।


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भीष्म पितामाह के अनुसार यदि स्त्री की मनोकामना पूरी न की जाए तो वह पुरुष को प्रसन्न नहीं कर सकती और उस अवस्था में पुरुष की संतान वृद्धि नहीं हो सकती, इसलिए स्त्रियों का सदा सत्कार और प्यार ही करना चाहिए। मान्यता है कि जहां स्त्रियों का आदर होता है, वहां देवता लोग प्रसन्न होकर निवास करते हैं। लेकिन ध्यान रहे कि जिस घर में स्त्रियों का अनादर होता है, वहां की सारे काम असफल हो जाते हैं, व्यक्ति जीवन भर मेह्नत करता है लेकिन उसे मनवाँछित सफलता की प्राप्ति नहीं होती है। यह भी माना जाता है कि जिस कुल की बहू-बेटियों को दु:ख मिलने के कारण शोक होता है, उस कुल का शीघ्र ही नाश हो जाता है।


महाराज मनु ने स्त्रियों को पुरुषों के अधीन करके कहा था- स्त्रियां अबला होती है ,स्वभाव से ईष्र्यालु होती है, मान चाहने वाली होती है, शीघ्र ही कुपित हो जाती है,सदैव पति का हित चाहने वाली लेकिन विवेक शक्ति से हीन होती हैं परन्तु फिर भी वे सम्मान के ही योग्य हैं, अत: हम सभी लोगो को सदा इनका सत्कार ही करना चाहिए क्योंकि स्त्री जाति ही धर्म की प्राप्ति का कारण भी है।

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संतान की उत्पत्ति, सन्तान का पालन-पोषण, लोक व्यवहार और जीवन का प्रसन्नतापूर्वक निर्वाह भी स्त्रियों पर ही निर्भर है। यह बिलकुल शाश्वत सत्य है कि यदि पुरुष स्त्रियों का सम्मान करेंगे तो उनके सभी मनोरथ निश्चय ही सफल हो जाएंगे।


स्त्रियों के कर्तव्य के संबंध में राजा जनक की पुत्री ने कहा है- स्त्री के लिए यज्ञ, धर्म, उपवास एवं श्राद्ध करना आवश्यक नहीं है, क्योंकि उसका सर्वोच्च धर्म केवल अपने पति की सेवा करना ही है। कोई भी स्त्री अपने पति की सेवा से ही स्वर्ग को प्राप्त करती है।

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हमारे शास्त्रों मे स्त्री को अबला माना गया है इसलिये उसकी रक्षा करने का दायित्व पुरुष का ही है। स्त्री की कुमारावस्था में उसकी रक्षा उसका पिता करता है, स्त्री की जवानी में उसकी ऱक्षा उसका पति करता है और वृद्ध होने पर पुत्र पर उसकी रक्षा का भार रहता है अत: स्त्री को कभी स्वतंत्र नहीं रहना चाहिए।शास्त्रों के अनुसार जो भी व्यक्ति अपने घर की स्त्रियों की रक्षा नहीं कर पाता है वह घोर नरक का पात्र होता है।

जो व्यक्ति किसी भी स्त्री का शोषण करता है उसकी मज़बूरी का फायदा उठाता है, बल पूर्वक उससे सम्बन्ध बनाता है उसके कुल का उसी की आँखोँ के सामने विनाश हो जाता है, उसके घर के सदस्य तरह तरह के रोंगो से ग्रसित हो जाते है,उस पापी व्यक्ति को वृद्धावस्था में घोर कष्ट प्राप्त होते है वह मृत्यु की लालसा करता है और उसे मृत्यु भी प्राप्त नहीं होती है और अंत में मृत्यु के पश्चात उसका रोम रोम नर्क का भागी होता है ।

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शास्त्रों के अनुसार स्त्रियां ही घर की लक्ष्मी हैं यदि वह प्रसन्न है तो उस घर में हर सुख और ऐश्वर्य होता है , इसलिए पुरुष को उनका भलीभांति आदर, सत्कार और उनसे स्नेह करना चाहिए।स्त्री को अपने वश में रखकर उसका हर्ष से पालन करने से स्त्री साक्षात लक्ष्मी का स्वरूप बन जाती है, व्यक्ति के मुश्किल से मुश्किल कार्य भी आसानी से सम्पन्न हो जाते है, अत: जीवन में सफलता और स्थाई ऐश्वर्य के लिये घर की स्त्रियों को हर हाल मे प्रसन्न रखना चाहिए ।

लेकिन जब स्त्रियां नाराज होकर जिन घरों को श्राप देती हैं, वे नष्ट हो जाते हैं। उनकी सुख, समृद्धि, स्थाई संपत्ति एवं यश का अवश्य ही नाश हो जाता है अत: किसी भी दशा में किसी भी स्त्री के साथ बुरा व्यवहार भूल कर भी नहीं करना चाहिए ।

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