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होलाष्टक, होलाष्टक में क्यों वर्जित है शुभ काम

holashtak

होलाष्टक, होलाष्टक में क्यों वर्जित है शुभ काम


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फाल्गुन मास की पूर्णिमा को होलिका का पर्व मनाया जाता है एवं इसकी सूचना होलाष्टक से प्राप्त होती है। फाल्गुन शुक्ल पक्ष की अष्टमी से लेकर होलिका दहन तक के समय को धर्मशास्त्रों में होलाष्टक का नाम दिया गया है।

ज्योतिष एवं धर्म शास्त्रो के ‘होलाष्टक’ के आठ दिन समस्त मांगलिक कार्यों निषिद्ध माने गए हैं। इस साल 2017 में होलाष्टक 05 मार्च से शुरू हो रहा है जो दुलहंडी अर्थात 12 मार्च तक रहेगा। माना जाता है होलाष्टक के दौरान शुभ कार्य करने पर अपशकुन होता है अतः इस दौरान कोई भी शुभ कार्य नहीं करने चाहिए ।

"होलाष्टक" के शाब्दिक अर्थ है, होला+ अष्टक अर्थात होली से पूर्व के आठ दिन, होलाष्टक कहलाते है। दरअसल होली एक दिन का पर्व नहीं वरन पूरे नौ दिनों का पर्व है जो चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा जिसे दुलहंडी कहा जाता है, के दिन रंग और गुलाल खेलने के साथ समाप्त होता है।

होलाष्टक से होली के आने की दस्तक मिलती है, साथ ही फाल्गुन शुक्ल पक्ष की अष्टमी के दिन से होली उत्सव के साथ-साथ होलिका दहन की भी तैयारियां जोर शोर से शुरु हो जाती है।

सबसे पहले होलाष्टक शुरु होने वाले अष्टमी के दिन होलिका दहन के स्थान ( होलिका सामन्यतया चौराहे पर जलाई जाती है ) पर गंगा जल छिड़क कर, वहाँ पर उसमें सूखे उपले, सूखी घास और होलिका दहन के लिये लकडियां लगानी शुरू की जाती है, सूखी लकडियां विशेष कर ऎसी लकडियां जो सूखने के कारण पेडों से टूट्कर गिर गई हों, उन्हें एकत्र किया जाता है।

होलाष्टक के दिन से होलिका दहन तक प्रतिदिन इसमें कुछ ना कुछ लकडियां डाली जाती है, जिससे होलिका दहन के दिन तक वहाँ पर लकडियों का ढेर लग जाता है। जिस दिन यह कार्य किया जाता है, उस दिन को होलाष्टक प्रारम्भ का दिन भी कहा जाता है। उसी दिन से होलिका दहन होने तक कोई शुभ कार्य संपन्न नहीं किया जाता है।

होलाष्टक के दिन से होली की शुरुआत भी हो जाती है. बच्चे , बडे सभी इस दिन से गुलाल से हल्की फुलकी होली खेलनी प्रारम्भ कर देते है। इसके अंतर्गत 06 मार्च को बरसाना में लट्ठमार होली तथा 07 मार्च को नंदगाँव में लट्ठमार होली खेली जायेगी।

होलाष्टक के दौरान शुभ कार्य वर्जित रहने की धार्मिक मान्यताओं के अलावा ज्योतिषीय मान्यता भी है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार
अष्टमी को चंद्रमा,
नवमी को सूर्य,
दशमी को शनि,
एकादशी को शुक्र,
द्वादशी को गुरु,
त्रयोदशी को बुध,
चतुर्दशी को मंगल तथा
पूर्णिमा को राहु उग्र रुप लिए हुए रहते हैं।

इससे पूर्णिमा से आठ दिन पूर्व से ही मनुष्य का दिल-दिमाग अनेक प्रकार की आशंकाओं से ग्रसित हो जाता है, जिसके कारण चैत्र कृष्ण प्रतिपदा तिथि को इन अष्ट ग्रहों की नकारात्मक शक्ति के क्षीण हो जाने पर सभी लोग रंग, गुलाल आदि खेलकर संतोष और प्रसन्नता प्रदर्शित करते है।

इन्ही सब कारणों से होलाष्टक की अवधि में हिंदू संस्कृति के बहुत से संस्कार और शुभ कार्यों की शुरुआत वर्जित है। शास्त्रीय मान्यताओं के अनुसार जिस क्षेत्र में होलिका दहन के लिए डंडा स्थापित हो जाता है, उस क्षेत्र में होलाष्टक के आठ दिनों में कोई भी शुभ कार्य नहीं किया जाता , अन्यथा अशुभ फल मिलते हैं। लेकिन इस समय में जन्म और मृत्यु के पश्चात किए जाने वाले कृत्यों की मनाही नहीं की गई है ।


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